Friday, 5 January 2018

लघु रामायण

आओ आओ एक बात बताएं , बहुत पुरानी  कथा सुनाएँ
त्रेता युग की है कहानी , नहीं किसी से है अनजानी


नदी एक सरयू थी बहती , दुःख-सुख अवध नगर के कहती
नगर अयोध्या थी  खुशहाल , पा दशरथ को थी निहाल
माता तीन पिता थे एक , उत्तराधिकार का था मतभेद



कैकई का क्रोधी अंदाज़ , राम नहीं हो भरत को आज राजा हारे रानी जीती , वचनबद्धता  प्रीती से जीती 
राम -लखन और पत्नी सीता , चले निभाने रघुकुल रीता
चित्रकूट और पंचवटी , यहीं रहे और बनी कुटी
१४ वर्ष का समय बहुत था , आशीर्वाद सभी का संग था
पिता चल दिए पुत्र वियोग में ,अयोध्या पूरी डूबी शोक में
अवध के घटना क्रम से बेखबर , भरत गए थे नाना के घर
घटना जान हो गए आहत , गद्दी की कभी नहीं थी चाहत

भरत चले भ्राता को लाने संग अयोध्या चली मनाने
भरत पादुका ही ला पाए , वचन भाई का तोड़ न पाए
समय हो रहा था व्यतीत , १४ वर्ष गए थे बीत
  सौष्ठव राम-लखन का भाया , 
विवाह प्रस्ताव सूपर्णखां  का आया
सहमत नहीं हुए जब भाई , 
सूपर्णखा की दिखी सच्चाई
वार सिया पर नहीं सह पाए
नासिका विहीन बनी निशचरी
क्रोधित लक्ष्मण रुक  नहीं पाए
सूपर्णखाँ ने  व्यथा सुनाई बदला लेने पहुंचे भाई
सबको मौत के घाट उतारा , तुरंत सभी का किया निपटारा
मोहित स्वर्ण मृग पर सीता , बुद्धि विनाश काल विपरीता
राम चले लाने मृग छाला  , लखन सिया का था रखवाला
करूं पुकार दी  एक सुनाई , राम पुकारे लक्ष्मण भाई
सुन पुकार सीता घबराई , रेखा खींच चल दिए भाई
साधू वेश में रावण आया , भिक्षा मांगी द्वार बजाया
सीता का फिर हरण कर  लिया , वायु मार्ग से लंका चल दिया
गिद्ध जटायु बचाने आया , रावण ने उसको मार गिराया
राम भटकते सीता की खोज में , जटायु मिल गया थड़ा था होश में
पानी पिया  वृतान्त सुनाया , और जाने का मार्ग  दिखाया
राम को मिलास संग वानर का , लंका पर कर  दी चढ़ाई
भीषण युद्ध हुआ उस युग में, चिन्ह आज तक पड़ें दिखाई
अंत हुआ रावण का और सीता से मिले रघुराई
लंका  राज विभीषण को दे राम को याद आया घर-बार
लखन सिया हनुमान चले पुष्पक विमान से अयोध्या द्वार
अभिनन्दन करने राम का उमड़-उमड़ अयोध्या आयी
खूब नगाड़े बजे नगर में अपार हर्ष और खुशियां छायी
घी के दीप जले घर-घर में ,हर द्वारे थी दीप कतार
छोटे-बड़े सभी जन खुश थे दीपावली की थी बहार
प्रथा चल पड़ी दीवाली की , हर्षोल्लास और खुशहाली  की
हर वर्ष  उल्लास  से दीप जलाएं , दीपोत्सव जम कर मनाएं

Friday, 15 December 2017

लौह भाई पुरुष सरदार वल्लभ

लौह भाई पुरुष सरदार वल्लभ पटेल को शत -शत नमन 🙏



सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1948 में उप-प्रधानमंत्री पद से अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी. इस संबंध में 12 जनवरी, 1948 को उन्होंने महात्मा गांधी को पत्र लिखा था. मगर गांधी की मंजूरी नहीं मिलने के कारण वह इस्तीफा नहीं दे सके. सरदार पटेल गांधी युग के उन चंद नेताओं में शामिल थे जो सिर्फ सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए जनसेवा के लिए सरकार में जाते थे. यदि किसी कारणवश वो जनसेवा नहीं कर पाते थे तो उनका पद खुद उन्हें बोझ लगने लगता था.
सही अर्थों में सच्चे देश भक्त और सेवक थे लौह पुरुष पटेल
 

Sunday, 10 December 2017

निष्पक्षता

निष्पक्ष चुनाव की दुहाई देते हुएता  समस्त विपक्षी दल EVM का विरोध कर मतपत्र से चुनाव के पक्ष में हैं
कल एक चैनल पर 'मतपत्र' की निष्पक्षता पर मोहर लगाते एक वरिष्ठ पत्रकार को सुना
८० के दशक में चुनाव के बाद एक ट्रक मतपत्रों से भरी पेटियां लेकर चला तो उसी नंबर का एक और ट्रक ठप्पे लगे मतपत्रों की पेटियां लिए खड़ा था जिसने पुराने ट्रक को रिप्लेस किया
उनका कहना था इस बात को सब जानते हैं काफी हल्ला हुआ लेकिन कोई सबूत किसी के पास नहीं था इसलिए कुछ नहीं हुआ
अब इससे ज़्यादा निष्पक्षता भी कहीं हो सकती है भला ?

निद्रा


१-रात्री आगाज़ 
चहकती नींद ने
पाँव पसारा
२-तम हराया 
टिमटिमाती लौ ने
विजयी दीप
३-झुकी पलकें
निंदिया आगमन
चिंतन मुक्त
४-असहनीय
अँधेरे का सन्नाटा
भोर प्रतीक्षा
५-खामोश रात
माँ की लोरी सुरीली
पलकें भारी
६-बंद आँखे
गहरी निद्रा आई
सजे सपने

Monday, 20 November 2017

हमारा इतिहास हमारा सम्मान

#BanPadmawatiMovie 
एक -दो दिन से कई पोस्ट पढ़ चुकी हूँ कि 
आज की महिलाओ के मान-सम्मान से दूर लोग इतिहास में अटके हैं 
आज की नारी का सम्मान हो न हो पद्मावती के सम्मान की चिंता है 
मुझे लगता है नारी इतिहास की हो ,आज की हो या भावी सम्मान सभी महिलाओ का आवश्यक और उतना ही महत्वपूर्ण। 
इतिहास का सम्मान भी उतना ही आवश्यक जितना वर्तमान का
इतिहास के प्रति उपेक्षा भाव भी ठीक नहीं ,हमारा इतिहास जड़ें हैं हमारी ,कोई व्यक्तिगत तो कोई राष्ट्रीय ,जड़ विहीन पनपता है क्या कोई ?
और जहां तक बात विरोध की तो भंसाली का इतिहास ही देख लीजिये हर फिल्म में कुछ न कुछ विवादास्पद दिखाता है ,
एक बार फिल्म रिलीज़ हो जाने पर क्या कुछ बदल पायेगा ?
बच्चे वही सच मान बैठते हैं इस लिए आवश्यक है सही तथ्य सही तरीके से सामने आना
हम व्यक्तिगत स्तर पर सोचे और हमारे दादा -दादी पर कोई गलत टिप्पणी करे तो कैसा लगेगा हमें
मुझे लगता है विरोध का तरीका गलत हो सकता है लेकिन बात सही है
चोर है भंसाली के मन में ,
भंसाली ने फिल्म दिखने का वादा किया तो दिखाता क्यों नहीं
आदत बन गयी है उसकी, गलत- सही बनाओ और दिखाओ
किसी मुगल आक्रांता पर फिल्म बना कर क्यों नहीं दिखाता ,?
नहीं दिखा सकता फतवे से डर लगता है

Friday, 3 November 2017

खिचड़ी हुई ग्लोबल

दिल्ली में 3 से 5 नवंबर तक वर्ल्ड फू़ड फेस्टिवल ...
अब भारतीय पतीली के साथ-साथ पूरी दुनिया में फैलेगी, भारतीय पारंपरिक खिचड़ी की सौंधी महक 🙂🙂🙂
देसी घी के साथ गर्मागर्म खिचड़ी का स्वाद लगभग हर भारतीय की जुबां पर होगा लेकिन अब जल्दी ही पूरी दुनिया इस स्वाद का लुत्फ उठाने वाली है

'खिचड़ी' अमीर हो या गरीब, हर रसोई की शान है 
किसी थाली में चटनी,पापड़ ,घी ,अचार के साथ तो किसी थाली में बिन अचार ही शोभा बढ़ाती है
लेकिन ये खिचड़ी है 😊 जब पकती है तो बड़े-बड़े चेहरों पर मुस्कान ले आती है
आशा है ये खिचड़ी की सौंधी महक दूर तक जायेगी ,मुंह में पानी ज़रूर ले आएगी

Sunday, 25 December 2016

सोच विचार

किसी की भावना को आहत करने का कोई इरादा नहीं 
त्यौहार जीवन की एकरसता को ताज़गी और ख़ुशी से भर देते हैं ,सर्व धर्म समभाव की विचार धारा वाले वाले इस देश में असंख्य त्यौहार मनाये जाते हैं 
कोई भी त्यौहार मनाने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए 
अगर आपकी ख़ुशी में कोई शामिल होता है तो आपका भी कर्तव्य है उसकी खुशियां बढ़ाई जाएँ
लेकिन अपने आप खुशियों में शामिल होने और थोपने में बहुत अंतर है 
कोई आपकी खुशियों को तो दीमक की तरह चट कर खोखला करता जाएं और अपनी खुशियों को सर पर सवार कर दे तो आपके पास आक्रोश के अलावा कुछ बचता है क्या ?????
यही हो रहा है होली ,दीवाली पर प्रदूषण, पानी औए नकली मिठाई का शोर मचा ऐसा कर देते हैं कि नयी पीढ़ी तो तौबा करती नज़र आती है
 हाँ आज क्रिसमस झूम कर मनाएगी ,नए साल के लिए कार्यक्रम बन रहे होंगे अभी से
 उस समय होने वाली आतिशबाजी भी लगता है पर्यावरण में सुधार लाती है ??
और ये परिणाम है सालों विदेशी सोच वाली सरकार के सत्ता में बने रहने का,जिसने भारतीय संस्कृति को छिन्न-भिन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ी,वामपंथ को बढ़ावा दिया और ईसाइयत का बीज गहराई तक रोप दिया जो अब वट वृक्ष बन गया है
UPA के दस साल ने तो देश को इटली बनाने का पूरा प्रयास किया और अगर समय रहते परिवर्तन न होता तो पता नहीं अभी और क्या हो रहा होता ??????
क्रिसमस ट्री के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई भी किसी को खराब नहीं लगती 
अब तो  फादर जॉन जैसे लोग टीवी पर आकर ऐसे आँख दिखाते हैं जैसे ईसाई धर्म भारत का मूल धर्म हो