Tuesday, 30 April 2013

देश का आधार

मजदूर दिवस पर विशेष .......

सड़क किनारे बसे बसेरे ,
चूल्हे जलते शाम -सवेरे 
कभी धूप में चलें हथौडे , 
कुदाल -फावड़े ने कभी घेरे 
शीत-लहर जब देती दस्तक , 
उंचा रहता तब भी मस्तक 
झुग्गियों की दिखती कतार , 
प्रशासन पर करे प्रहार 
हाथ हथौड़े आँख अंगार , 
अस्त्र -शस्त्र ले रहे तैयार 
कभी कुल्हाड़ी लिखे तहरीर , 
कभी सोयी लगती तकदीर 
खेत-खलिहान को कभी सहलाते , 
कभी कृषक बन कनक उगाते 
चीर कभी धरा का सीना बाहर हरियाली ले आते 
कंक्रीट के जंगल में नए मोर्चे नयी है जंग,  
रंगहीन कुछ स्वप्न हो जाते .कुछ में भर जाते हैं रंग 
दस्तावेज़ ईट-पत्थर के यूँही नहीं लिख जाते 
रण-बाँकुरे खून-पसीने से अक्षर चमकाते 
स्थान बनाए रखने को अपना , लड़नी पड़ती जंग 
उड़ान भरेंगे संग सपनो के , हो ना जाए भंग 
भूल गए कर्णधार इन्हें , नहीं देते सम्मान 
आधार यही मज़बूत देश के ,इनमें बसते प्राण


Saturday, 27 April 2013

सुख और दुःख




सुख और दुःख धरती के, ध्रुव की तरह होते हैं
लेकिन प्रतिक्रया में दोनों के, आंसू ही होते हैं
एहसास में दर्द के, झलकते हैं हैं आंसू
आवेग में ख़ुशी के ,टपकते हैं आंसू
बहुमूल्य  है वो बूँद, जो आँखों में लरजती है 
टपके ना जब तक ,कीमत पता नहीं चलती है 
भावनाओ का वेग जब, अश्कों में बदल जाता है
उर का वो तूफ़ान , नैनों से निकल जाता है
गिरने वाला हर अश्क ,एक जैसा नज़र आता है
सुख - दुःख का रिश्ता, इन अश्कों से बांध जाता है 
क्या है फर्क   ???    और किस से इसका नाता है 
आँख और अश्कों के सिवा कोई नहीं जान पाता है 
सच्चा हम दर्द ही, ये जान पाता है कि
टपकी बूँद का किससे (दुःख या सुख ) ,, नज़दीक का नाता है

यादें ,व्यथा और सच्चाई


ना चिड़िया का चहचहाना ,ना कांव -कांव काग का ,
अंत हो चला है शहरों में पंछियों के राग का
महानगर तो  इस दौड़ में बहुत आगे हैं ,

बुजर्ग भी भूल गए हैं कि कभी मुर्गे की बांग पर भी जागे हैं 
घडी के अलार्म में बांग कहीं खो गयी है , 
अब तो यही आवाज़ अपनी साथी हो गयी है 
याद है पक्षियों का शाखों पर मंडराना , 
अपनी सुर ताल में गाना ,गुनगुनाना
सांझ होने का एक अदभुत एहसास पाया है ,
कई आकृतियों में  गगन में उड़ता पंछियों का झुण्ड आज भी दिमाग पर छाया है
कलरव करता ,बसेरों की ओर बढ़ता ,
पंछियों का झुण्ड आसमान में होता था 
सूर्य को विदा देता सांझ का आगाज़ ,
बड़ा ही मनोरम होता था
चूल्हे से उठती सुगंध ,नथुनों में समाती थी , 
स्याह परिधान में लपटी रजनी द्वार पर नज़र आती थी 
दिन भर के थके पथिक बाहँ पसार कर स्वागत करते थे ,
निद्रा के आगोश में मीठे  सपने बुनते थे
आज महा नगर जीवन की आपा -धापी में , सुबह शाम भूल गया है ,
सपने की बिसात क्या !! निद्रा से भी विमुख हो गया है 
ये बड़े -बड़े शहर रात भर जागते हैं , 
मशीन बन चुके मनुष्य सड़कों पर भागते हैं
वाहनों  की चिल्ल -पों ने बघिर  कर  दिया है ,
स्वच्छ ,नीले आसमान को भी झुलसा कर स्याह कर दिया है 
तारों भरा थाल केवल स्वप्न बन गया है ,
सर पर धवल चांदनी नहीं काला तम्बू तन गया है
चन्दा मामा भी अब नज़रें चुराते है ,
बच्चों को भी वो अब याद नहीं आते हैं 
याद नहीं कब चैन की नींद आई थी , 
मीठे स्वप्नों की तृप्ति कब मुख पर छाई थी
स्वप्न भी मीठे नहीं, दुखदायी होते हैं , 
सुबह की चिंता में पलक बड़ी मुश्किल से बंद होते हैं 
ना सुकून है दिन में ना रात में आराम , 
जीवन की आपा धापी ने मेरे छीन  लिए सुबह शाम
चक्र है समय का ,परिवर्तन स्रष्टि  का नियम ,
बदलना है साथ इसके रख कर संयम 

प्रकृति का नियम




पीले  पत्ते पेड़ों से गिर कर , नए पत्तों को स्थान दे रहे हैं...

यही नियम बनाया है प्रकृति ने ,उसे सम्मान दे रहे हैं.....

मानव भी इसी तरह ,जीवन -पथ पर चलता ,पत्ते सा झड जाता है....
किसी माँ की कोख का कोई नन्हा शिशु ,उसका स्थान पा जाता है.......

नदिया का जल भी समुद्र में विलीन हो , नए जल का स्थान बनाता  है.......
तरु का फल भी मिट जाता है , और नए बीज को जन्म दे जाता है.......

जो विनम्र और सहनशील बन इस नियम को अपनाता है......
वही  महान बन अमर हो जाता है..........

जो समझ न सका इस बात को , अपनी अकड़ दिखता है.......
वह किसी अकड़े तालाब की भांति दूषित  और उपेक्षित हो जाता है 

अंतत


आज सुबह खाना बनाने से छुट्टी मिली तो उसे ये बदलाव बड़ी ही राहत दे गया  सुबह लंच पैक न करने से छुटकारा मिला ये बदलाव उसे बहुत भाया  
उसने अपने दैनिक कार्य पूर्ण किये एक कप चाय बना कर  गैस बंद की दो रस्क निकाले और कप उठा कर कमरे में आगई आज सोच लिया था उसने 
शब्दों को मना कर रहेगी ..........आज कुछ फुर्सत भी है 
उसे मनाना ही होगा अपने रूठे शब्दों को ......कुछ दिनों से प्रयत्न करने पर भी शब्द साथ नहीं दे रहे थे ...........वो चाहती थी कुछ लिखना ...
मन के भावों को कागज़ पर उकेरना .....!!
लेकिन शब्दों ने भी ठान लिया था .नहीं , साथ नहीं देंगे मोर्चा खोल लिया था जैसे उसके  खिलाफ
ऐसा पहली बार नहीं हुआ था बीच -बीच में उसके अक्षर उसे ऐसे ही परेशान करते और फिर एक दिन अचानक उसके सामने आ खड़े होते ...
पैन उठाया और लिखने ही लगी थी कि दरवाज़े पर बैल बज उठी उफ़ ...कोफ़्त हुई उसे ..........
लेकिन खोलना पडा दरवाज़ा ........
फ्लेट संस्कृति और एकल परिवार एक बाध्यता बन चुकी है .महानगरों में .....लेकिन उसे ज़रा भी पसंद नहीं है ....... दरवाज़ा खोल कर रह नहीं सकते हैं और  बेल बजने पर तो खोलना ही होगा अब अकेले आदमी के लिए मुश्किल होता है ..........आप कहीं व्यस्त हो सकते हैं 
कई बार जब बाथरूम में हों तो बाहर खड़े व्यक्ति की झुंझलाहट चरम पर होती है ..........
खैर दरवाजा खोला तो सामने अक्कू  खडा था यानी अंकित ऊपर की मंजिल पर रहता है ..........
दरवाज़ा खोलते ही पैरों पर झुक आया ...अरे क्या हुआ .........उसने झुक कर उठा लिया उसे .....बड़ी आंटी मेरा जन्म दिन है ......ओह अच्छा याद आया ..कल ही तो भावना  मिली थी ,  अक्कू की मम्मी और उसने बताया भी था ......भूल ही गयी में .....
उसे आशीर्वाद दियाप्यार किया और देखा तो घर में मीठे के नाम पर एक मात्र बेसन का लड्डू  था ..लेकिन अक्कू काम तो बन ही गया .......उसके मुह में रख दिया ......दस वर्षीय बच्चा खुश होता चला गया .......ऊपर रहता है उसका परिवार ...दादा -दादी ,चाचा -चाची भरा पूरा परिवार लेकिन घर के सभी मर्द दम्भी दुष्ट और सही मायने में ना मर्द थे ...........शाम होते ही घर का 'बार' खुल जाता क्या पिता और क्या बेटा महफ़िल जम जाती तो देर रात तक चलती ........
अक्सर शोरशराबा भी होता था .......लेकिन क्या किया जाए एक तो पड़ोसी दूसरे भावना बहुत प्यारी और व्यहवहार कुशल थी 
अठारह फ्लेट वाली इस बिल्डिंग में सब  उसके परिवार के सदस्य ही थे ..........अपने परिवार के विरूद्ध जाकर कभी कुछ ना बोलती लेकिन किसी से कहाँ कुछ छिपा था .........!!!
अरे !!! क्या सोचने लगी थी वो कलम और कागज़ हाथ में थे ..और वो उड़ चली थी भावना के घर ..........शाम को अंकित के लिए कुछ लाना होगा बाज़ार  से |
उसने सोचा चाय की और देखा तो ठंडी हो मुह चिढा रही थी ......कोफ़्त हो आई उसे .....एक कप चाय भी नसीब नहीं ढंग से ......
लेकिन अब मन नहीं था बनाने का तो उसने बिना चाय के ही रस्क का टुकडा मुह में डाल लिया ......और फिर से अपने लक्ष्य पे ध्यान केन्द्रित कर दिया ............
अभी लिखने का प्रयत्न  कर ही रही थी कि फोन बज उठा उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ ..!! बेमन से उठाया लेकिन उठाते ही चहक उठी ....
अच्छा !!!....कब आ रही है ??|
पूछा था उसने ........उसकी प्रिय सहेली राधा और उसके बेटी अनुभा  आ रही थी  राधा एक छोटे कस्बे में रहती थी .सिर्फ १२ क्लास तक ही वहां पढ़ सकते थे अनुभा  ने पास के एक शहर से 
बी काम अच्छे नंबर में पास किया था लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए कोई उचित साधन नहीं था .....इस लिए उसे यहाँ कोई कोचिंग करनी थी पूरी बात कहाँ बतायी थी ..............आने पर सब जान ही लेगी अभी तो उसके आने की तैयारी करनी होगी ........बहुत साल बाद मिल रहे हैं ..........
याद नहीं कब मिले थे ..???? हाँ समाचार मिलते रहते थे ........
खैर उसके आने में अभी दो -तीन घंटे थे अच्छा हुआ फोन किया .........आज सुबह उसने कुछ नहीं बनाया ही नहीं था क्षितिज टूर पर गया था और रजनीश के यहाँ आज पार्टी थी तो दोपहर के खाने के लिए मना कर दिया था ........अब उस ने अपने लिए भी कहाँ कुछ बनाया था ......
उसे लगा आज भी शब्दों से मनुहार नहीं हो पाएगी चलो देखते हैं कब तक नहीं मानते !!
सोचते हुए ..कापी और पैन रख रसोई में आ गई ........ चाय की तलब तेज़ हो गयी .थी पहला काम वही किया .........उसने क्या नशा है सोच कर हंसी आ आ गयी ? ...........
फिर सब्जी बनाने की तैयारी करने लगी .........
चालीस मिनट बाद वहां बिताने के बाद उसने एक सब्जी ,रायता बना लिया ,आटा मल  कर रख दिया पुलाव की भी तैयारी हो गयी आज अपनी मर्ज़ी से खाना बनाया है कल उसकी पसंद से बनाएगी खूब जानती है उसकी पसंद को !!!.........अब वो निश्चिन्त थी ........लेकिन अब उसका मन नही हुआ कि कापी या कलम को हाथ लगाए ...............फिर भी प्रयास करने लगी कि कलम कुछ साथ दे लेकिन बार -बार राधा उसके विचारों में आ खड़ी हुई तो उसने कलम और कापी एक और रख दी और मन में स्मृतियों की गर्द हटती चली गयी 
तीन बेटियों की माँ राधा की  दास्तान कोई भिन्न नहीं थी समाज में तीन बेटियों की माँ होना घोर अपराध की श्रेणी में आता था 
 राधा भी घोर अपराधी थी ............जघन्य अपराध था उसका  ....................
सरकारी संस्थान में एक अच्छे पद के स्वामी उसके पति ना तो पति अच्छे थे .......
ना ही अच्छे पिता बन पाए थे .........बच्चों ने बचपन नहीं जाना क्या होता है ??.
घर में एक तनाव मय माहौल रहता था सास के ताने -उलाहने ,ननद की छींटाकशी
पति की दुत्कार की परिणति धीरे -धीरे दादी , बुआ और पिता की उपेक्षा में होने लगी थी .बुआ शादी कर अपने घर ज़रूर चली गयीं थी पर उनका अनावश्यक  दखल हमेशा बना रहा राधा के घर में 
यही सब देखते -देखते उसकी बेटियाँ बड़ी होने लगी ..............
बेटियों ने जान लिया था कि उनका और माँ का क्या स्थान है इस घर में लेकिन कहाँ जाते .........
जैसे -तैसे निर्वाह होता .....पैसे की कोई कमी नहीं थी पर बेटियाँ एक -एक चीज़ के लिए तरसती थी
समय बीतता रहा समझौते को नियति मान माँ -बेटी समय काट  रही थी .....एक समय आया दादी नहीं रही तो पति अकेले रह गए ......अब बहन भी अपने बच्चों की पढ़ाई में व्यस्त हो गयी तो पतिदेव को परिवार का महत्त्व समझ आया ..........अब जाकर बच्चों की आवश्यकता को समझना आरम्भ किया है रिश्ते  भी धीरे  -धीरे सुधर रहे हैं ........में स्वयं राधा के घर के बदलते परिवेश को सुन कर अनुभव कर सकती हूँ .......और बड़ी ही प्रसन्नता होती है ...........
तभी ध्यान आया अरे शाम को अक्कू का जन्म दिन भी है तो क्यों न बाज़ार का काम ही निपटा लूँ ......जल्दी से घर का ताला लगाया और निकल पड़ी राधा के आने से पहले ये काम हो जाएगा ...फिर आराम से गप्प हांकेंगे .......वह लौटी तो शाम ढल रही थी ...........जाकर अक्कू को उसका गिफ्ट दिया और बाद में ना आ सकने में असमर्थता जताई ...भावना ने प्यार भरा उलाहना दिया ..लेकिन में उसे समझा कर उसके गाल पर हलकी चपत लगा वापस आ गयी 
.सीढियाँ उतर नीची आई तो राधा को दरवाज़े पर पाया ..............
अरे कब से खड़ी है ..??.....मैंने  उसे गले लगाया ........
.'पहले दरवाज़ा खोल दस मिनट से तेरे घर की बैल बजा रहे हैं ...........
ओह !!  हाँ अरे आओ ना ........
जल्दी से ताला खोल उसका सामान उठाया और अन्दर आगई .........
अनुभा को गले लगा कर प्यार किया ......और उनके नाश्ते की तैयारी में जुट गयी ..............
कोल्ड काफी के साथ चिडवा ले आई तो राधा बोल उठी अब सिर्फ चिडवा ही खाने नहीं आये हैं तेरे यहाँ तुझे पता नहीं मेरे खाने के शौक का ? कह खिलखिला कर हंस पड़ी ....... 
हाँ -हाँ जानती हूँ अनुभा ने अजीब सी नज़रों से माँ को देखा तो वो भांप गयी.........
अरे बेटे तुम मत पड़ो बीच में .....ऐसा ही है हमारा  रिश्ता ......
अनुभा मुस्करा  दी .......कितनी प्यारी है अनुभा ...........
बचपन में देखा था तब से आज देख रही हूँ उसने सोचा ...........
नाश्ता कर अनुभा सोफे पर लेट गयी और आँखे बंद कर ली ....उसने कहा भी अन्दर जाकर आराम से लेट जाए नहीं मानी .........
राधा भी अब आराम अनुभव कर रही थी .............
खाना तैयार ही है बोल लगाऊ क्या ...????.....उसने पूछा 
अरे नहीं अभी नहीं ....कुछ देर बाद खायेंगे ......अब  बैठ कर बात करते हैं ........
सालों हो गए मिले ..........राधा फिर चहकी ........
बहुत खुश लग रही थी .....
हाँ ज़रूर .......अभी आती हूँ ज़रा ये बर्तन हटा दूँ ..बर्तन अन्दर रख वो लौट रही थी
तो कापी और पेन नज़र आये कापी  खुल गयी थी पता नहीं कैसे ..?
उसने तो बंद की थी ..............
आज भी नहीं मना पायी थी वो रूठे अक्षरों को .....लगा लिखे अक्षर अपनी जीत पर जश्न मना रहे थे उसने कापी बंद की वो राधा की ओर चल दी ............
अंतत अक्षर जीत गए थे .........................


·          

Wednesday, 24 April 2013

.स्मृतियों की सैर



               
चुरा लिए हैं कुछ पल मैंने ,बचपन की .स्मृतियों से 
संग सखियों के व्यय करेंगे ,अपने स्मृति कलश भरेंगे 

.स्मृतियों में गोदी दादी की ,हठ है और ठिनकना है 
मक्की की सौंधी रोटी संग ,शक्कर दूध और मखना है 

ओत -प्रोत माँ की झिडकी से ,मधुर स्मृति झांकी खिड़की से 
धूल ज़रा सी और हटाई ,माँ ने कपोल पर चपत जमाई 

कमरे में हैं कई खिलौने , केरम और शतरंज जमी है 
कभी साइकिल तेज़ चल रही ,संग सखियों के रेस लगी है 

अपने इस छोटे से अँगने ,स्मृतियाँ बिखरी है हर कौने 
उचल-कूद और हाथापाई , सचमुच हो गयी कभी लड़ाई 

हल्का सा छू लिया दीवार को ,गूंजा बीता हास -परिहास 
हंसी -ठिठौली और चिढाना ,गा रहे गाना आस -पास 

रसोई देख भावुक हो आई, कलुछ हाथ माँ पड़ी दिखाई 
स्वादिष्ट और सुगन्धित व्यंजन ,करते थे सबका अभिनन्दन 

मीठी प्यारी .स्मृतियों में विचरण दूर-दूर तक कर आये 
स्मृति कलश को लगा ह्रदय से वर्तमान के दर पर आये 

Monday, 22 April 2013

आज़ादी पर्व ,

मना रहे आज़ादी पर्व ,हम करते हैं वीरों पर गर्व 
दूर भगाया था अंग्रजों को ,चूर -चूर कर उनका दर्प


खुली हवा में सांस ले रहे ,भाग गए वो रात आधी
वीर शहीदों के प्रयास से ही ,मिली हमें है आज़ादी

बलिदान ना भूल जाएँ हम उन वीर शहीदों के
नत -मस्तक हो जाएँ मिल कर सम्मान में वीरों के

थोड़ा गुलाल ,


थोड़ा गुलाल , थोड़ा विशेष प्यार ......

 आपके अपने प्रियतम कुछ यूँ सोच रहे हैं ------------

'सोच रहा हूँ इस होली पर.. दिल के रंग निकालूँगा

रंग से रंगे बिना ही प्रियतमा .. होली आज मना लूंगा ।

एक रंग होगा आलिंगन का , शर्म से तुझको लाल करे

सतरंगी इतनी बन जाओ ..मेरा हाल बेहाल करे .....।

अबीर गुलाल दूंगा अधरों से .. तेरे सुर्ख कपोलों पर 

दिल की भाषा सुने सुनाएँ..विराम रहेगा बोलों पर

अधरों से होगा अधरों पर .. वो तो रंग निराला होगा

उसकी रंगत कभी ना उतरे ..भंग निराला ऐसा होगा.

ये पंक्तियाँ समर्पित हैं ...... सभी सखियों को




सखियों नव वर्ष की खुमारी ..

मंद किया सबने, दीपक को

प्यार करे प्रीतम, जब प्रिय को


सोच लिया है मैंने साथी


कम न करूंगा, दीपक-बाती

प्यार करूंगा जब भी तुझको


बाहों में जब लूंगा तुझको 



खोल केश में तेरे लूंगा

इस साए में प्यार करूंगा

विवादों से दूर ....दो पंक्तियाँ ....


..१----
.मुमताज 'महल' में सोयी 'जहाँ' है ..........
...एक शाह का जहाँ वहां है ..................
२-
..श्वेत 'संग' की एक इमारत
..'संग' त्तराश ने लिखी इबारत ......

३-
जीवन के कुछ लम्हे उदास हैं 
रहते दिल के बहुत पास हैं

पृथ्वी की व्यथा------------पृथ्वी दिवस पर विशेष



जब स्रष्टि की रचना हुई थी तो किसी ने पृथ्वी की आज की भयंकर स्थिति के बारे में सोचा भी नहीं होगा.
ईश्वर का नियम है ...रचना और विनाश 

..........सृष्टि का विनाश भी निश्चित है | 
और शायद अंत का प्रारम्भ हो चुका है 
आज प्रथ्वी खून के आंसू रो रही है...........हर कोई निराश है ,
मानव से सब इतना निराश है कि अपनी व्यथा किस से कहे ,कैसे कहे...........?..
एक दिन प्रकृति की सभा हुई और सबने अपना-अपना दुखड़ा रोया...........

सबसे पहले आई पृथ्वी..
.......

पृथ्वी------हरी -भरी सी मैं थी धरती ,जल पवन भी थे भरपूर
लोगो में जो स्वार्थ बढा तो ,जीवन से मुझे कर दिया दूर
अब मेरा ये हाल तो देखो ,बर्बादी की चाल तो देखो.......:(-

प्रकृति -----झरने ,नदिया ,हरे पेड़ों से ,स्वछ हवा के म्रदु झोंकों से
सराबोर मै रहती थी ,खुशियाँ ही खुशियाँ जीवन में
कितने सुख में रहती थी
झरने नदियों का संगीत ,पेड़ों की वो हरियाली
स्वच्छ हवा के शीतल झोंके ,कुछ नहीं अब सब है खाली

वृक्ष -----हाल किया क्या मानव तूने , क्यों सब कुछ बिसराया
उपभोग किया भरपूर हमारा,, फिर हमको ठुकराया
मीठे फल और फूल पत्तियां ,हमसे ली सौगात
पीठ दिखाई अब तुमने और पहुंचाया आघात -

वर्षा -----ठीक कहा भैया ये तूने ,तुझ पर थी मैं निर्भर
जब से हाल हुआ ये तेरा जीना हो गया दुर्भर
अब तो भैया चहुँ भी तो कभी -कभी ही पडूँ दिखाई
रोकर अपने दिन मैं काटू, किस से अपने दुखड़ा बांटू-............

ये सभा चल ही रही थी कि , कुछ अवाछित तत्व आ धमके और वो भी अपनी गाथा गाने लगे......और मज़ाक बनाने लगे ......सबसे पहले प्रदूषण आया ........
और बोला........

प्रदूषण....हाहा ...हाहा. .....हाहा....हाहा ........मैं हूँ प्राणी कुछ नया .
मेरा डेरा नया बसा ...लेकिन मैंने इस धरती को
अपने कब्ज़े में किया.......................................................
अपना -अपना भाग्य भैया अपनी -अपनी माया ............................................
सबने अपना दुखड़ा रोया ,अपना राग यहाँ गाया ......................................
लेकिन मैं तो यहाँ बहुत खुश हूँ...........हाहा ...हाहा ....

धुँआ ------ए भाई क्यों इतना खुश होते हो ,,
मैंने हमेशा तुम्हारा हमेशा साथ निभाया है
तभी तुमने दुनिया को इतना सताया है ,
तभी तो तुमने दुनिया को इतना सताया है....

सी ऍफ़ सी (क्लोरो फ्लोरो कार्बोन )-------अरे रे .........अरे रे ...सुनो सुनो
बहुत दुष्ट हूँ मैं भी भाई ,यही बात मैं कहने आई
यही बात मैं कहने आई, और तीनो मिल कर नाचने लगते हैं

सूरज भी अपनी लाचारी व्यक्त किये बिना नहीं रह पाता.............

सूरज ----वैसे तो मैं जीवन दाता अँधेरा मुझको नहीं है भाता .....................
प्रदूषण ने मजबूर किया है कष्ट तभी मैंने दिया है .

अवांछित तत्वों के सामने सभी लाचार और मजबूर नज़र आ रहे हैं...........
और मानव को कोस रहे हैं................
काश मानव इतना लालची और स्वार्थी ना हुआ होता ..........................
तो शायद प्रथ्वी कि ये दुर्दशा ना हुई होती.............

कुछ बच्चे आते हैं और प्राण लेते हैं हम कुछ बातों का ध्यान रखेंगे .........लोगो को जागरूक बनायेंगे और अपनी पृथ्वी को बचायेंगे ............

रुनझुन -रुनझुन

बाँध पाँव में नन्ही पायल ,रुनझुन -रुनझुन करती थी 
इधर -उधर किलकारी भरती ,सबको प्यारी लगती थी 

रोज़ सुबह सुहानी होती , हर दोपहर सुनहरी  थी 
हर सांझ को संग नन्ही के ,माँ भी गुनगुन करती थी |

दो-चार समस्या से होता था  ,जीना तो कुछ था दुश्वार 
नन्ही रुनझुन में खुशिया पा  , हंसी-ख़ुशी  रहता परिवार 

रोज़ नए सपने बुनते थे ,हर तार में कई -कई रंग थे 
उस नन्हे मुख की शोभा को ,देख-देख कर वो जीते थे 

इक दिन सुबह घटा घिर आयीं ,काला अंधियारा ले आयीं 
मुरझाई फिर धूप सुनहरी ,हर मुख पर मलिनता छाई

माँ मन ही मन कुछ घबराई ,भागी -भागी बाहर आई 
आसमान में काला साया ,देख उसे बस मूर्छा आई 

रंग पानी में धुल गए थे रंगहीन धागे बिखरे थे 
नन्ही पायल टूट गयी थी 
नन्ही पायल की रुनझुन को जाने किसकी नज़र लगी थी ..........

Sunday, 21 April 2013

प्रश्न और सुझाव

माँ का दुलार सब पर भारी है
भाई , बहन तुझ पर वारी -वारी है
पत्नी के इंतज़ार में भी बेकरारी है
बेटी की मुस्कराहट कितनी प्यारी है

चार रूप है समक्ष आपके
ईश्वर की उत्कृष्ट रचना
लेकिन समाज में दीन-हीन स्थान लिए
इनके पीछे सिर्फ और  सिर्फ
नारी है ,नारी है और नारी है

ये रक्त के और भावनात्मक रिश्ते
 जुड़े हैं आपके दिल से ,या कोई लाचारी है ?

ज़रा सा ह्रदय में झांके ,संवेदनाएं जगाएं
भावनाओ को मस्तिष्क से ह्रदय में ले आयें
मानसिकता की सीमा बढ़ा कर वैचारिक स्तर पर
स्वस्थ और स्वच्छ समाज हेतु पग बढायें............

Thursday, 18 April 2013

कविता दिवस पर

'कविता' दिवस पर 'कविता' ने सोचा
में भी लिखूं कोई 'कविता' लेकिन कैसे ??
कभी तो लिखी नहीं ........!!!!!
दिमाग दौडाया दिल को सोच में लगाया
शब्द कर एकत्र ,उसमें कुछ तारतम्य बिठाती हूँ ...
नहीं माने तो अड़ जाउंगी लेकिन उन्हें कविता ज़रूर बनाउंगी
थोड़ी भावुकता , थोड़ा दर्द भी चाहिए
दिल के उमड़े भाव चेहरे पर होने चाहिए
सच्चा भाव होगा तो ज़रूर शब्द साथ देंगे
ईमानदारी के लौहे को हाथों हाथ लेंगे
दर्द की लकीर जब चेहरे पर आएगी
आँखों से आंसुओं की झड़ी लग जायेगी
यकीन है मुझे मेरी भी एक कविता बन जायेगी
और रह जाएगा मेरा मान, आज कविता दिवस पर ........

Friday, 5 April 2013

...............ममता की गोद ...



.


अरे सुनता क्यों नहीं अभी कच्चे हैं चावल और उबाल ! दादी ने एक चम्मच चावल खाए ही थे कि कर्कश स्वर में बोल उठी ......
विशु ने निराश हो भगोने में थोडा सा पानी डाला और फिर से गैस पर रख दिया .............ये पांचवी बार था .......
गैस धीमी कर उसने मुह पर पानी डाल लिया .......पसीना -पसीना हो रहा था आधे घंटे पहले ही स्कूल से लौटा था ......
.................................भूख उसे भी लगी थी लेकिन क्या करे ???

ये रोज़ का नियम है ...........जब से माँ  नहीं रही रोज़ उसे रोज़ ही इसका सामना करना पड़ता है .............घर में घुसते ही वो अपना बैग भी  रख नहीं पाता कि दादी का स्वर सुनाई देता है अरे जल्दी कर भूख लगी है ............
.
वो झुंझला उठता है लेकिन क्या करे ?????????...कोई चारा नहीं उसके पास हंस कर या रोकर उसे करना ही पड़ता है ............!!!!!!

जब माँ थी तो वो खाने में बड़े नखरे करता था माँ बड़े ही मनुहार से उसे खिलाती ..............उसे स्कूल खाना ले जाना पसंद नहीं था .........

माँ बैग में छुपा कर रख देती थी लेकिन वो निकलवा कर ही मानता ..........आज उसे सब बहुत याद आता है ..........काश !!!!! माँ होती ........और वो उस से लिपट जी भर रो लेता .............

 सोते समय रोज़ एक ही विनती करता है विशु भगवान् से ....हे ईश्वर मुझे माँ से ज़रूर मिलाना सपने में ..और कभी -कभी भगवान् उसकी सुन भी लेते हैं जब उठता है तो उसे याद भी नहीं रहता कि माँ के साथ क्या किया या .माँ ने क्या कहा .बस इतना ही ध्यान रहता है कि माँ को देखा था उसके पास थी वो उसके लिए यही बहुत है ..........उस दिन वो बहुत खुश रहता है ........... .लेकिन रोज़ तो ऐसा होता नहीं ........फिर भी वो निराश नहीं होता रोज़ इसी आशा में सोता है कि आज आएँगी माँ ...आज आएँगी .........
कहाँ हो माँ ...???.कहाँ चली गयी .........?.क्यों चली गयी .............??..........विशु बुदबुदाया 

.इन्ही सवालों के बीच उसने प्लेट में फिर से चावल डाले दाल फिर से गरम की.और दादी को दे आया ...........हाँ अब ठीक है दादी का स्वर सुना तो बड़ी राहत मिली उसे ...............उसने कपडे बदले मुह हाथ धोया और अपने लिए भी दाल -चावल मिला कर कमरे में आ गया ...........पंखा चला खाना ही चाहता था कि आवाज़ आई अरे पानी दे जा ......उफ्फ्फ्फ़ ....कैसे भूल गया .....जग भर दादी के कमरे में स्टूल पर रख आया और खाना शुरू ही किया था कि उसे जोर से रुलाई फूट पड़ी..........मम्मा कहाँ चली गयीं ........???????? .........

कुछ देर रोने के बाद मन हल्का हो गया .........खाना ठंडा हो गया था उसे गले से नीचे उतार बर्तन वहीँ रख वो निढाल सा बिस्तर पर पड़ गया .......जब माँ थी तो आते ही सीढ़ियों से चिल्लाता .......मम्मा क्या बनाया है बहुत भूख लगी है ........खाना ना ले जाना उसे सीढ़ियों से ही चिल्लाने पर विवश कर देता था 
माँ हंसती और कहती .और मत ले जाया कर खाना ........फिर जल्दी से मनपसन्द खाना उसके सामने होता .........
एक दुर्घटना ने माँ को छीन लिया पांचवी क्लास में था वो ........लेकिन माँ के जाने का मतलब खूब जानता था ........कुछ समय बाद पापा की कंपनी बंद हो गयी और अचानक उनकी नौकरी भी चली गयी
.....अब विवशता थी ......बीमार दादी को लेकर कहाँ नौकरी ढूंढें ........???..........विशु को छोड कर कहाँ जाएँ ........बस यहाँ शहर जो काम मिला था कर रहे थे ......लेकिन बड़ा मुश्किल समय था .......सुबह दादी का काम पापा कर जाते ...नाश्ता भी बनाते दोपहर के लिए सब्जी या दाल भी बना जाते लेकिन दोपहर में चावल रोज़ आ कर विशु को बनाने पड़ते थे ..और कक्षा सात में पढने वाले बच्चे के लिए ये काम बड़ा कठिन था ...... ..........विशु तो अपने दोस्तों से भी कट गया था ......स्कूल जाता और दोपहर का खाना दादी को खिला कर अपने कमरे में कैद हो जाता ..........स्कूल का काम करता और टी वी देख सो जाता .......रोज़ का यही नियम था ..............कभी-कभी उसे लगता दादी जान -बूझ कर उसे परेशान करती हैं .........पापा समझाते ऐसा नहीं है बेटा उनकी उम्र है ऐसा समय सबके साथ आता है ....................सोचते -सोचते विशु को नींद आ गयी .........सोते में उसके मुख पर एक मुस्कान खिंची थी ........एक तृप्ति थी उसके मुख  पर .
...शायद माँ उसके पास थी ............स्वप्न में ही सही ...वो ममता की गोद में था ...............