--जिंदगी में क्या नहीं है ? समझो सब कुछ यहीं- कहीं है धूप -छाँव है , हँसी -ख़ुशी है , सुख है ,दुःख है कुछ नहीं कम , सब कुछ एक साज़ पर बजता एक ही है इसकी सरगम...!!! अपनी अकुलाहट , छटपटाहट सब कुछ इन शब्दों में सहेजने का प्रयास करती हूँ मन को शांत करने का , एक -दूसरे के मन में झाँकने का , अपने ही विचारों को उकेर कर सामने लिखा देखने का एक बहुत सुंदर माध्यम है ........... कई बार शब्द साथ नहीं देते लेकिन अक्सर कुछ न कुछ शब्दों के माध्यम से बाहर आता रहता है ............
मुखपृष्ठ, कविता, कहानी ........
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Wednesday, 3 May 2023
पहलवानो का धरना
Monday, 15 August 2022
स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव
Wednesday, 9 September 2020
कादम्बिनी बनी अतीत
Thursday, 6 August 2020
धर्मनिरपेक्षता रूपी पाखंड
Tuesday, 4 August 2020
राम मंदिर आंदोलन
ऐतिहासिक पल
जय सिया राम
जय श्री राम
Sunday, 2 August 2020
मित्रता -'सुंदर भाव'
Thursday, 30 July 2020
शिक्षा नीति 2020
इतिहास सम्बन्धी परिवर्तन पर अवश्य ध्यान देना निशंक जी , हमारे ऐतिहासिक तथ्य कुछ चोरों ने चुरा लिए
वो भी पढ़ने को मिल गए तो जीवन सफल लगेगा 😀😀
Thursday, 4 June 2020
हाँ ऐसी ही थीं माँ
---हाँ ऐसी ही थी ' माँ '...
कीर्तन , गीत -संगीत ....इसके अलावा अनावश्यक घूमना तो बेहद बुरा समझा जाता .........सबके लिए एक लक्ष्मण रेखा थी और सबको पालन करना होता था ....अनिच्छा का भी कोई प्रश्न नहीं था .......समय ही ऐसा था ...सब इच्छा से ही होता था .........
कहानी है एक लड़की की .......' माँ 'की ...!!!!!!!
आठ भाई -बहनों का भरा--पूरा खुशहाल एवं संपन्न परिवार ........तीन भाई और एक बहन से छोटी पांचवें नंबर की संतान बेहद खूबसूरत , तीखा नाक -नक्श , गोरा रंग ....प्रतिभा शाली .!!!...........कंठ में सरस्वती का वास ...........वाद्य यन्त्र ..जैसे हारमोनियम , तबला , ढोलक में पारंगत ...नृत्य के क्या कहने ..........
पाक कला में भी निपुण ....
ये कोई अतिश्योक्ति नहीं ......सत्य वचन .
ईश्वर ने सब दिया था पढने का भी बड़ा शौक था ......बड़ी बहन की शादी के बाद माता की सेहत ठीक ना रहने के कारण.पढ़ाई रोक दी गयी थी उस समय ये कोई नई बात नहीं थी , बड़ा आम था सब कुछ........
घर पर ही रह कर पढने कहा गया ..........
मन तो नहीं था लेकिन विरोध नहीं कर सकती थी,वो समय ही और था .........
कक्षा आठ तक घर पर रह कर पढ़ाई की लेकिन जूनून ऐसा था .
.भाई -बहन सबकी किताबों का एक -एक अक्षर चट कर जाती, चाहे कोई भी विषय हो .....
फिर समय बीता .....
कुछ समय बाद एक सरकारी अफसर के साथ शादी हुई जो स्वयं पुस्तकों के शौक़ीन थे .........
ईश्वर का शुक्रिया किया कि चलो साथ मिला तो एक
बुद्धिजीवी का !!......इसी पढने के शौक ने ज्ञान भी बढाया .......
नयी जानकारी दी ....
अपनी संतानों को भी यही सब विरासत में दिया .......जिस बात के लिए बच्चे बहस करते या परेशान होते उसे बड़ी ही सहजता से बता देती किसी शब्द का अर्थ हो या किसी व्यक्ति विशेष की जानकारी लेनी हो उनके लिए बाएं हाथ का काम था .........
कक्षा दस भी पास नहीं कर पायीं थी लेकिन पढने की ललक ने ज्ञान अर्जित कर ही लिया था ........
अच्छा साहित्य ,अच्छी पुस्तक यही साथी बने रहे .....और ..बच्चों के दोस्त आश्चर्य व्यक्त करते .....
.'तेरी मम्मी ने बताया अच्छा' ...!!!!....
बनाव-श्रंगार से भी कोई लगाव नही था बेहद साधारण और सौम्य थीं वो
कोई भी अवसर होता तो सिर्फ अपनी सिल्क की क्रीम कलर की साडी और हार पहन लेती ......अब उस छवि का क्या वर्णन करूँ में ....
एक दम नैसर्गिक सौन्दर्य था उनका ........
आथित्य के तो कहने क्या ....कई बार किसी के अचानक आ जाने से जब हम बहने असहज हो जाती तब वो बड़ी ही कुशलता से घर में ही कई सामान जुटा नाश्ता और खाने का शाही सरंजाम कर देती
हमेशा घर के बने नाश्ते को प्राथमिकता देती थी
कभी नाश्ता बाहर से नही आया
कोई द्वार से कभी भूखा नहीं गया ....
.
पंछी ,..गाय, ..कुत्ते ....सबके लिए उनके यहाँ दाना -पानी था ......तीज -त्योहार , सप्ताह के सातों दिन उनका सीधा ( पूजा का सामान ) निकलता ........
कुष्ठ आश्रम के लोग एक निश्चित समय पर आते और जो बन पड़ता ले जाते
...........पडौस में किसी की कोई आवश्यकता अगर वो पूरी कर सकती तो अवश्य करती .....
वो तो बस निस्वार्थ सहायता करती .....किसी भी सीमा तक जा कर ...जो कई बार हम बच्चे पसंद नहीं करते था और उन्हें रोकने का प्रयास करते
लेकिन वो कभी झुंझला कर और कभी चुप रह कर अपने मन की कर ही लेती थी
.पिता पूरा सहयोग देते कई बार हम बच्चों को मना करते ...कहते मत रोको ....करने दो .....
.दान -पुण्य भी हद से ज़्यादा होने पर पिता का यही कहना था .....
आस्था किसी तर्क का विषय नहीं है ...
और वे हमें शांत करा देते
कई बार ऐसे अवसर आये निराशा ने आ घेरा ...लेकिन हर बार दुगने उत्साह से सामना किया
कई बार समाज से टकराने की नौबत भी आई तो भी साहस से सामना किया .....
शायद कई बार टूटी भी !! लेकिन किसी को एहसास तक न होने दिया ...........
.....जिंदगी ने परीक्षा कदम -कदम पर ली .....लेकिन वो जीवट महिला आगे बढती रही हर समस्या को झेलती रही ...........पति भी साथ छोड़ गए लेकिन उसने अपने दायित्व बखूबी निर्वाह किये
सभी दायित्व पूर्ण कर जब वो एकाकी रह गयीं तो हम बच्चों ने सोचा अब वो कुछ चैन से जी सकेंगी
अपने मन की कर पाएंगी .लेकिन पता नहीं क्यों ..???.
जिंदगी भर जिंदगी से लोहा लेने वाली ये साहसी महिला एकांत नहीं झेल पायीं ....और एक दिन बिना मन की बात कहे इस संसार से चल निकली
बच्चे जब तक पहुँचते वो कोमा में जा चुकी थी .
तीन दिन तक अस्पताल में रह कर अंतिम विदा ली
लोगो ने कहा पुण्य आत्मा
सच में वो पुण्य आत्मा थी
उस एकांत पीडिता महिला की अंतिम यात्रा में मानो आधा शहर उमड़ पड़ा था
लोगो का सैलाब नज़र आ रहा था ...
आज हम बच्चे भी समझ रहे थे जिन बातों के लिए वो अक्सर उन्हें मना करते थे ...उसी का प्रतिफल था ये
.ये उनकी जिंदगी भर की पूँजी थी ...
..जाना ही था उन्हें ,आज नहीं तो कल ........
लेकिन दिल आज भी कचोटता है .........
काश!! हम समय पर पहुँच जाते .!
.क्या था उनके मन में जान पाते ...
याद उसे किया जाता है जिसे भूले हों ......
वो तो आज भी हैं हमारे मन में ..
सदैव रहेंगी 🙏🙏🙏🙏........
बहिष्कृत चीन
Sunday, 10 May 2020
हाँ ऐसी ही थीं माँ
सबके लिए एक लक्ष्मण रेखा थी और सबको पालन करना होता था
अनिच्छा का भी कोई प्रश्न नहीं था ......
समय ही ऐसा था,सब इच्छा से ही होता था
'माँ' की ...!!!!!!!
तीन भाई और एक बहन से छोटी पांचवें नंबर की संतान बेहद खूबसूरत , तीखा नाक -नक्श , गोरा रंग ,प्रतिभा शाली .!!
कंठ में सरस्वती का वास ..........
वाद्य यन्त्र ..जैसे हारमोनियम , तबला , ढोलक में पारंगत ,नृत्य के क्या कहने ..........
पाक कला में भी निपुण ....
ये कोई अतिश्योक्ति नहीं
सत्य वचन .
बड़ी बहन की शादी के बाद माता की सेहत ठीक ना रहने के कारण.पढ़ाई रोक दी गयी थी उस समय ये कोई नई बात नहीं थी , बड़ा आम था सब कुछ
घर पर ही रह कर पढने कहा गया
मन तो नहीं था लेकिन विरोध नहीं कर सकती थी
वो समय ही और था
भाई -बहन सबकी किताबों का एक -एक अक्षर चट कर जाती, चाहे कोई भी विषय हो
कुछ समय बाद एक सरकारी अफसर के साथ शादी हुई जो स्वयं पुस्तकों के शौक़ीन थे
ईश्वर का शुक्रिया किया कि चलो साथ मिला तो एक
बुद्धिजीवी का !!
नायब तहसीलदार के पद पर आसीन मेरे पिता पुस्तक प्रेमी थे , नियमित साप्ताहिक और मासिक पुस्तकें, पत्रिकाएं घर की शोभा बनते थे
इसी पढने के शौक ने ज्ञान भी बढाया .......
नयी-नई जानकारी दी ....
जिस बात के लिए बच्चे बहस करते या परेशान होते उसे बड़ी ही सहजता से बता देती किसी शब्द का अर्थ हो या किसी व्यक्ति विशेष की जानकारी लेनी हो उनके लिए बाएं हाथ का काम था
कक्षा दस भी पास नहीं कर पायीं थी लेकिन पढने की ललक ने ज्ञान अर्जित कर ही लिया था
अच्छा साहित्य ,अच्छी पुस्तक यही साथी बने रहे .
और बच्चों के दोस्त आश्चर्य व्यक्त करते .....
'तेरी मम्मी ने बताया ??? अच्छा' 🤔🤔.!!!!....
कोई भी अवसर होता तो सिर्फ अपनी सिल्क की क्रीम कलर की साडी और हार पहन लेती अब उस छवि का क्या वर्णन करूँ में
एक दम नैसर्गिक सौन्दर्य था उनका
कई बार किसी के अचानक आ जाने से जब हम बहने असहज हो जाती तब वो बड़ी ही कुशलता से घर में ही कई सामान जुटा नाश्ता और खाने का शाही सरंजाम कर देती
कभी नाश्ता बाहर से नही आया
.
पंछी ,गाय,कुत्ते सबके लिए उनके यहाँ दाना-पानी था तीज -त्योहार , सप्ताह के सातों दिन उनका सीधा
( पूजा का सामान ) निकलता
कुष्ठ आश्रम के लोग एक निश्चित समय पर आते और जो बन पड़ता ले जाते
किसी भी सीमा तक जा कर
जो कई बार हम बच्चे पसंद नहीं करते थे और उन्हें रोकने का प्रयास करते ,टकराव भी हो जाता था
करने दो
लेकिन हर बार दुगने उत्साह से सामना किया
शायद कई बार टूटी भी !!
लेकिन किसी को आभास तक न होने दिया
लेकिन वो जीवट महिला आगे बढती रही हर समस्या को झेलती रही
पति भी साथ छोड़ गए लेकिन उन्होंने अपने दायित्व बखूबी निर्वाह किये
अपने मन की कर पाएंगी ,लेकिन पता नहीं क्यों ..???.
जिंदगी भर जिंदगी से लोहा लेने वाली ये साहसी महिला एकांत नहीं झेल पायीं
और एक दिन बिना अपने मन की बात कहे वो अपनी अनंत यात्रा पर निकल पड़ीं
उन्हें आभास था कि उनकी महायात्रा सावन माह में ही सम्भव है तो पूरे साल कहीं भी रहें वो सावन में अपने घर ही रहती थीं
आज श्रावण की त्रयोदशी थी , भोले का जलाभिषेक कर कृपापात्र बनने का दिन
ऐसे किसी भी अवसर पर उनकी आस्था चरम पर होती थी
लेकिन आज वो अपनी अंनत यात्रा पर निकल चुकी थीं
बच्चे जब तक पहुँचते वो कोमा में जा चुकी थी .
लोगो ने कहा पुण्य आत्मा
आज हम बच्चे भी समझ रहे थे जिन बातों के लिए वो अक्सर उन्हें मना करते थे
उसी का प्रतिफल था ये
काश!! हम समय पर पहुँच जाते ☹️☹️
क्या था उनके मन में जान पाते
वो तो आज भी हैं हमारे मन में
सदैव रहेंगी 🙏🙏🙏🙏........
Tuesday, 24 March 2020
कोरोनिया प्रहार
Sunday, 22 March 2020
साधुवाद लड़ाकों
सनातनी घण्टे, घड़ियाल और शंखनाद अकारण ही नही करते 😊 कई वैज्ञानिक तथ्य हैं इसके पीछे
Saturday, 21 March 2020
प्रार्थना 🙏🙏
चीन की क्रूरता
Friday, 13 March 2020
नमस्ते कोरोना
क्या आपने कभी विचार किया है कि
प्रत्येक वर्ष रथ यात्रा के ठीक पहले भगवान जगन्नाथ स्वामी बीमार पड़ते हैं
उन्हें बुखार एवं सर्दी हो जाती है
बीमारी की इस हालत में उन्हें Quarantine किया जाता है
जिसे मंदिर की भाषा में अनासार कहा जाता है
भगवान को 14 दिन तक एकांतवास
यानी Isolation में रखा जाता है
आपने ठीक पढ़ा है 14 दिन ही Isolation की इस अवधि में भगवान के दर्शन बंद रहते हैं एवं भगवान को जड़ी-बूटियों का पानी आहार में दिया जाता है
यानी Liquid Diet और यह परंपरा हजारों साल से चली आ रही है
अब इक्कीसवीं सदी में पश्चिमी लोग हमें पढ़ा रहे हैं कि
Isolation & Quarantine का समय 14 दिन होना चाहिए
वो हमें ऐसा पढ़ा सकते हैं क्योंकि
*हम स्वयं सोचते हैं कि हिंदू धर्म अन्धविश्वास से भरा हुआ अवैज्ञानिक धर्म है*
जो आज हमें पढ़ाया जा रहा है
हमारे पूर्वज हजारों साल पहले से जानते थे
*गर्व करो अपने धर्म पर*
*अपनी सभ्यता पर और अपनी परंपराओं पर*
लोग भारतीय संस्कृति को अपना रहे हैं
Sunday, 21 August 2016
एक तथ्य
Friday, 9 May 2014
शहादत का डंका पीटने वाली भारत की विदेशी सरकार की एक और पोल खुली----!!!
'उन्होंने दावा किया कि
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत 17 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी.
नेताजी 20 अगस्त 1945 को बर्मा में छितांग नदी के किनारे पड़े मिले थे.
जापान के सैनिकों ने उन्हें वहां से उठा लिया था.
इन आंखों ने जापानी सैनिकों द्वारा नेताजी को उठाकर ले जाते हुए देखा है.
सरकार ने बगैर मेरा बयान दर्ज किए ही नेताजी की मौत की अफवाह उड़ा दी.'
कर्नल' निज़ामुद्दीन की युवावस्था की तस्वीर
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वाराणसी के रोहनिया की रैली में पैर छू कर आशीर्वाद लिया नरेंद्र मोदी ने
सुभाष चंद्र बोस के ड्राइवर और अंगरक्षक रह चुके हैं
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत 17 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी.
नेताजी 20 अगस्त 1945 को बर्मा में छितांग नदी के किनारे पड़े मिले थे.
जापान के सैनिकों ने उन्हें वहां से उठा लिया था.
कर्नल' निज़ामुद्दीन का घर, जिसके ऊपर तिरंगा लगा हुआ है.
यह दावा किसी और का नहीं, 114 वर्षीय कर्नल निजामुद्दीन का है.
कर्नल निजामुद्दीन उन दिनों नेताजी के निजी ड्राइवर व अंगरक्षक थे.
निजामुद्दीन बुधवार को काशी विद्यापीठ में विशाल भारत संस्थान द्वारा आयोजित समारोह में भाग लेने आए थे.
इस दौरान उन्होंने बताया कि नेता जी को अंतिम बार उन्होंने खुद बर्मा की छितांग नदी के किनारे देखा था.
उन्होंने दावा किया कि इन आंखों ने जापानी सैनिकों द्वारा उन्हें उठाकर ले जाते हुए देखा है.
सरकार ने बगैर मेरा बयान दर्ज किए ही नेताजी की मौत की अफवाह उड़ा दी.
कर्नल ने बताया कि नेता जी 12 सिलेंडर वाली गाड़ी से चलते थे.
वह बेहद साधारण तरीके से रहते थे.
सुरक्षा के नाम पर उनके साथ मात्र तीन चार लोग थे.
मैं उनकी गाड़ी चलाता था.
साक्ष्य के तौर पर उन्होंने आजाद हिंद फौज का परिचय पत्र भी दिखाया.
11 भाषाओं के जानकार हैं कर्नल
कर्नल निजामुद्दीन की हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, जर्मन, जापानी, बांग्ला सहित ग्यारह भाषाओं पर पकड़ हैं.
अचूक निशानेबाज
कर्नल अचूक निशानेबाज भी माने जाते हैं.
उन्होंने बताया कि सन 1945 में युद्ध के दौरान ब्रिटिश जहाज मार गिराया था.
नेताजी के कहने पर लौट आया.--------
मुबारकपुर आजमगढ़ के ग्राम ढकवां निवासी कर्नल निजामुद्दीन पांच जून 1969 में सिंगापुर से भारत लौटे.
उन्होंने बताया कि
सिंगापुर में फंसे सभी भारतीयों को वापस भेजने के बाद नेताजी ने लौटने का आदेश दिया था.
नेताजी के आदेश पर ही हम भारत आ गए.




