Friday, 7 June 2013

पारिजात के पुष्प













छोटे और सुन्दर पारिजात के पुष्प
जन्म लेते ही भारी विपदा से निपटते हैं
भोर की पहली किरण पर झूमते
नत मस्तक हो धरा को चूमते हैं
नियति मान कर्तव्य का मान रख
पारिजात के योद्धा चुनौती को निकलते हैं
बिना सिलवटों के चादर सामान
धरा को ढक अभिमान से ,प्रणेता को तकते हैं
सिर्फ अधिकार नहीं ,दायित्व की भाषा भी खूब समझते हैं
जीवन की आहुति से भी नहीं डरते
जड़ों से कटने का दर्द भी अन्दर ही निगलते हैं ...
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13 comments:

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    1. धन्यवाद रीता जी

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  2. सुन्दर प्रस्तुति..।
    साझा करने के लिए आभार...!

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-06-2013) के चर्चा मंच पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  4. सुंदर रचना

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    1. धन्यवाद वर्मा जी

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  5. पारिजात ही जड़ों से कटने के दर्द को इतनी सहजता से झेल जाते हैं। सुंदर रचना अरूणा जी।

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  6. भोर कि पहली किरण और पारिजात का जमीन को चूमना गजब प्रतिबिम्ब.

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  7. आभार रचना जी

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  8. बहुत उत्तम ... परिजात का पुष्प सदा स्तान पाता है रचनाओं में ...

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    1. आभार दिगंबर जी

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