Monday, 22 April 2013

रुनझुन -रुनझुन

बाँध पाँव में नन्ही पायल ,रुनझुन -रुनझुन करती थी 
इधर -उधर किलकारी भरती ,सबको प्यारी लगती थी 

रोज़ सुबह सुहानी होती , हर दोपहर सुनहरी  थी 
हर सांझ को संग नन्ही के ,माँ भी गुनगुन करती थी |

दो-चार समस्या से होता था  ,जीना तो कुछ था दुश्वार 
नन्ही रुनझुन में खुशिया पा  , हंसी-ख़ुशी  रहता परिवार 

रोज़ नए सपने बुनते थे ,हर तार में कई -कई रंग थे 
उस नन्हे मुख की शोभा को ,देख-देख कर वो जीते थे 

इक दिन सुबह घटा घिर आयीं ,काला अंधियारा ले आयीं 
मुरझाई फिर धूप सुनहरी ,हर मुख पर मलिनता छाई

माँ मन ही मन कुछ घबराई ,भागी -भागी बाहर आई 
आसमान में काला साया ,देख उसे बस मूर्छा आई 

रंग पानी में धुल गए थे रंगहीन धागे बिखरे थे 
नन्ही पायल टूट गयी थी 
नन्ही पायल की रुनझुन को जाने किसकी नज़र लगी थी ..........

21 comments:

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    1. हार्दिक धन्यवाद शास्त्रीजी

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  2. शब्द नहीं मिले
    गले रुंध गये

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    1. विभा जी समय कितना खराब आ गया है
      सब बच्चियां सुरक्षित हों
      हंसती खिलखिलाती रहे ............आभार आपके आगमन का

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  3. itna marm bhar diya hai aapne is kavita main... kuchh kahne ke liye shabd nahi hain mere paas.... bas sabhi chhote bachchon ki chinta lagi rahti hai ...

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    1. This comment has been removed by the author.

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    2. सही कह रही है सब बच्चों का बहुत ध्यान रखना होगा ..........मेरा मन कई दिन से बहुत परेशान है ........................

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  4. आज की ब्लॉग बुलेटिन भारत की 'ह्यूमन कंप्यूटर' - शकुंतला देवी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. शुक्रिया ब्लॉग बुलेटिन ......आभारी हूँ आपकी ..सादर

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  5. दुआ है कि ये समय जरा जल्दी ही गुजर जाए ....

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    1. जी निवेदिता जी .........आभार आपका .......

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  6. मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ....

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    1. मोनिका जी हार्दिक धन्यवाद ........

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  7. सटीक रचना .हर माँ यह सिख लें की बेटा,बेटी में अंतर करना महा पाप है परिवेश पहले घर में परिवर्तन करने की आवश्यकता है तभी लड़के लड़कियों को इज्जत देंगे
    latest post सजा कैसा हो ?
    latest post तुम अनन्त
    l

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    1. प्रसाद जी .......सच कहा आपने ..........
      हार्दिक आभार आपका

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  8. najer lagi vahshiyo ki darindo ki ,

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    1. सही कहा गीता जी आपने ............

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  9. बहुत सही और सटीक रचना , कोई ऐसे जुल्म करने का सोच भी कैसे सकता है .. बेहद मर्मस्पर्शी

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    1. सच पता नहीं कैसे लोग बेरहम हो जाते हैं .......
      .........हार्दिक धन्यवाद उपासना जी .......

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    1. अंजू जी आज की परिस्थितियां जटिल हो चली हैं नारी के लिए ........

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