Sunday, 23 October 2011

गाय एक महत्त्व पूर्ण जानवर है




-गाय का वैज्ञानिक महत्त्व -

जो पहले कभी था जब गाय को खाने के लिए अच्छा और पौष्टिक  मिलता था वो पूजनीय थी और सब उसका सम्मान करते थे घर की पहली रोटी पर उसका अधिकार होता था 

आज कोई रोटी बना  ले तो गाय ढूंढनी पड़ती है ...मिल जाती है तो पता नहीं खाएगी या नहीं ...????/
तब इन बातों का बड़ा ही महत्त्व था पर आज शंका है बल्कि कहना होगा मुश्किल है ये बात  सच होना .

आज तो पालतू गाय भी कितना अच्छा चारा खा रही हैं  नहीं जानते 

.किस चीज़ में क्या मिला है क्या बोया क्या काटा कुछ नहीं पता ....पर फिर भी वो आज भी फायदे मंद हैं क्यों कि  एक बात यह भी कही जाती है कि गाय त्रण पदार्थ यानि चारा कैसा भी खाले चाहे विषेला खाले तब भी दूध लाभकारी होता है 

पर आज की गाय त्रण छोड़ कर सब कुछ खाती है .????..,जो गाय सड़क पर घूमती हैं उनका तो ईश्वर ही मालिक है ...एक -एक गाय ढेरों पोलीथिन का भोजन करती नज़र आती है .

बरहाल जो बात कभी सच थी अगर आज भी होती तो कितना फायदा था ...........??????????----------------------------------
गाय के शुद्ध दूध में रेडियो विकिरण या रेडिएशन से लड़ने की शक्ति होती है , रूसी वैज्ञानिक शिरोविच ऐसा मानते हैं .......

जहाँ गोबर से लिपाई पुताई होती है वो घर रेडियो विकिरण से मुक्त होते थे ....
ह्रदय रोग से बचाता था गाय का दूध , स्मरण शक्ति बढाता था |

गाय के एक तौला घी से हवं  करने पर एक टन आक्सीजन  बनता था ???
क्षय रोग के कीटाणु गोबर या गौ मूत्र की गंध से मर जाते थे .....रोगियों को गाय के निकट रखा जाता था 

गौमूत्र में तांबा होता है जो मनुष्य को सर्व रोग विनाशक शक्ति देता है 

इस का बछडा बड़ा होकर हल और गाडी चलाने के काम आता है 
हमारी मान्यता यहाँ पश्चिम से भिन्न है वो कृषि और मांस दोनों के लिए गाय पालते हैं ...पर हमारे यहाँ सिर्फ कृषि ही उद्देश्य है 

आज कल सभी जानवरों की दुर्दशा हो रही है और गाय जो  हमेशा से पूज्या रही है .......बे-बस और लाचार नज़र आती हैं ...........
पहले गौ ह्त्या नहीं होती थीं  अंग्रेजों ने अपने को मज़बूत बनाने के लिए मुस्लिमो को उकसाया और तब से गौ ह्त्या होने लगी 

बंगाल में बकरीद पर गौ ह्त्या होती रही हैं अदालती रोक के बाद भी , केरल में तो ऐसा कोई क़ानून ही नहीं है .........
वैज्ञानिक मत ये भी है कि...बूचड़ खाने भूकंप को बुलावा देते हैं 

Thursday, 20 October 2011

आँखों में इन्द्र धनुष



चाय बना कर वृंदा ने गैस बंद की और कप लिए कमरे में आ गयी ,
दूध भी अपने उफान को अंजाम देने के लिए तैयार ही था पर वृंदा के मन में एक तूफ़ान था जो उसे बे-चैन किये था बाहर से आ रहे  तेज़ बारिश के  शोर ने बेचैनी और बढ़ा  दी ..
कुछ  भी अच्छा नहीं लग रहा था वृंदा को
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क्या करे ....!!! क्या होगा ..??? आज उनके एक गलत कदम ने उन्हें जिंदगी  के कई वर्ष पीछे धकेल दिया था ...काफी दिन के तनाव और उठा पटक के बाद वो दिन आगया  था जिस से वो बचना चाहते थे ...,अब कोई चारा भी नहीं था , कल उसके घर का पंजीकरण हो गया था आज अपने ही छोटे से घर में मालकिन से बेगानी चुकी थी ....एक पल को तो लगा था कोई बुरा सपना देख रही है , पर सब सच था ................
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 ..........शेयर बाज़ार ने उसके पति को ऐसा जकड़ा कि  बार -बार की चेतावनी भी उन्हें चंगुल से बचा नहीं सकी और .. 
आज वो अपने नीड़ को  तिनका -तिनका होते देख रही थी .........बड़े ही कष्ट उठा कर   इस फ्लेट को   अपना कह पाए थे ज़्यादा दिन नहीं रही ये खशी और मुट्ठी से रेत की भांति फिसल गयी थी | ...आह ..!!! एक टीस उठी उसके दिल में .. आज संकट की इस घडी में उसे अपने माता- पिता  दोनों ही बहुत याद आ रहे थे ................................................
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पिता तो कब के जा चुके थे , माँ को गए एक ही साल हुआ था ........ उनका संघर्ष  ! जो उन्होंने पग -पग पर किया था .... उसके लिए प्रेरणा था .!..चलचित्र की भांति ही सब घूम रहा था ..... 

वृंदा , अतीत का एक -एक पल .....जी लेना चाहती थी फिर से .,......
संकट की इस घडी में ये पल संबल बन गए थे ....... 

अचानक दरवाज़े पर दस्तक ने उसे वर्तमान में ला पटका ......... 
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बेटा अक्षित स्कूल से लौट आया था .. सर से पैर तक भीगा सामने खडा था .....जाओ कपडे बदल लो.....बैग हाथ से लेकर उसने निर्देश दिया और बाहर झांका बारिश अभी थी  .......... 
मम्मा क्या बनाया है ......??  रोज़ यही सवाल ......खाने में हमेशा एक नखरा जो वृंदा को बिलकुल पसंद नहीं पर कभी -कभी समझौता करती है आज उसका मन नहीं था बहस में पड़ने का तो बोली .....
तुम क्या खाओगे ..?????? आलू परांठा और नानाजी का नमकीन .......ठीक है ....बेटे के लिए ब्रंच बनाया प्रतीक्षित दूध को भी उबाल तक अंजाम दिया ... नाश्ता दे कर वही आ बैठी ........
बेटा रोज़ की ही भांति खाते -खाते अपने दिन भर का घटना क्रम सुना रहा था और वो अनमनी सी सुन रही थी ..  

वृंदा ने घडी पर नज़र दौड़ाई अभी अनुज को आने में समय था
बाहर झांका  बारिश रुक चुकी थी  सामने  थी  ईश्वर की एक  सुन्दर रचना  इन्द्रधनुष !!!....जिंदगी  भी बिलकुल इसी तरह होती है अनेक रंगों से भरी ......सोचा उसने ....... .....................
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अतीत की परतें खुलती गयीं  .......मम्मा मुझे एन सी सी के कैम्प जाना है ...ठीक है सब तैयारी अच्छी तरह करना , मम्मा मुझे आज देर हो जायेगी .....अच्छा आज .खाना लेकर जाओ .........ना जाने ऐसी ही कितनी घटनाएं ...........मम्मा आज हमारे स्कूल में मेला लगा है .....मम्मी आज रामलीला चलें ...ना जाने कितनी  ही यादें ??????........... .........................
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एक बड़े परिवार के  दायित्व निभाते हुए मध्यम वर्ग की ज़िंदा दिल और  साहसी महिला थीं वो ........
पांच  बेटियां , बूढी बीमार  सास और पति सुबह से शाम तक असीमित कार्य थे .......बावजूद इसके वो अपनी रुचियों को बरकरार रखे थीं ,पढ़ना ..सिलाई बुनाई , संगीत .....उनकी जिंदगी की रीढ़ थे ...अपने दायित्वों में उन्होंने अपनी रुचियों को खोने नहीं दिया .........मोहल्ले में होने वाली सभी महिला संगीत क़ी जान थीं वो .......
उनकी थाप के बिना लय ही नहीं बनती थी ............

ईश्वर ने गज़ब सौन्दर्य दिया था ....साधारण साड़ियों में भी वो आकर्षण बनाए रहती थी ,,....सजते -संवरते कभी  नहीं देखा था ,शौक नहीं था या परिस्थितियों ने साथ नहीं दिया कभी समझ नहीं पायी वृंदा .............कभी वृंदा को लगता कि अभावों के चलते उन्होंने अपनी इच्छाओं का दमन किया था .......
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पांच बेटियों के पिता होते हुए भी पापा और मम्मा हमेशा खुश और संतुष्ट नज़र आते ...अपनी बेटियो के साथ बड़े ही खुश नुमा  माहौल में जीवन बिता दिया रहे थे ....दादी को कई बार अपने इकलौते बेटे के बेटे को देखने की उत्कंठा होती ....और वृंदा को लगता है कि शायद यही कारण रहा होगा कि माँ ने हम कई बहनों को जन्म दिया ...........बहुत शांत , सुलझे और सोच- समझ के साथ निर्णय लेने वाले उसके पिता बेटियों के बहुत करीब थे 
ऐसे पिता और बहुमुखी प्रतिभा  की धनी माँ ने अपनी बेटियों  को भरपूर स्नेह और विश्वास दिया था .....अभाव भी रहे , तंगहाली भी झेली ......  पिता अपनी नौकरी में राजनीति के शिकार हो गए  और नौकरी गँवा बैठे थे  बड़ा परिवार था पर पिता और माँ हमेशा समय से संघर्ष करते नज़र आते थे ......... ........------------------------------------------------
मम्मा , पापा आ गए .....अक्षित की आवाज़ ने तन्द्रा भंग कर दी ......वह चौंक कर उठी ...."सुनो एक शादी में जाना है , अभी निकलना है खाना नहीं खाउंगा , जाना ज़रूरी है वरना मन नहीं है मेरा बिलकुल भी जाने का ,  अनुज अन्दर आते हुए बोले ....

 जिंदगी किसी के लिए नहीं रूकती तुम्हे जाना ही चाहिए ...
वृंदा ने कुछ सोच कर कहा
जानती थी अनुज भी इतनी बड़ी घटना के बाद अच्छा  महसूस नहीं कर रहे हैं ..... वृंदा को बड़ी राहत मिली ...खाना बनाने के झंझट से बच गयी थी वो  आज सिर्फ अपनी यादों में खो जाना चाहती थी ...........

अनुज देर से आने को कह ,जल्द ही निकल गए ... 
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और आज वृंदा सब कुछ भूल अपने बचपन से लेकर युवा होने तक का समय फिर से यादों में जी लेना चाहती थी ......... ...
समझदार होने पर वो कायल हो गयी थी माता -पिता की....!!!! 

अचानक अतीत का एक पन्ना पलटा और पिता अस्पताल में नज़र आये वृंदा और ऋतु अभी पढ़ रही थीं बाकी तीन  बहने शादी के बाद अपनी - अपनी गृहस्थी  में व्यस्त थीं ......उन दिनों बहुत संवेदनशील और भावुक माँ किसी चट्टान  की तरह नज़र आयीं ........
जब कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था ..माँ ने आगे बढ कर पिता को मेडिकल में भरती कराने का फैसला कर डाला था ....सबको लग रहा था कुछ नहीं होना वाला है पर माँ के निर्णय को सभी ने सम्मान दिया था ...... तीन दिन के कुछ असहनीय और कठिन पलों के बाद जिंदगी ने निर्णायक मोड़ ले लिया  और पिता असमय ही  अनंत यात्रा पर निकल पड़े  ........ 
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सब कुछ बिखर गया ..... माँ के पास कुल जमा पूँजी  थी  थोड़ा सा पैसा ,एक घर ,  दो बेटियाँ  ..लेकिन अभी बेटियों की पढ़ाई के साथ -साथ अनेक समस्याएँ मुह बाए सामने थीं .....लेकिन माँ ने खामोशी ओढ़ ली और अपने दायित्व निर्वाह में लग गयीं 

माँ ने सब कुछ बड़ी ही खामोशी से संभाल लिया था ...एक अनकहा समझौता वृंदा , ऋतु और माँ के बीच हो गया था ...जिंदगी धीरे -धीरे चल निकली थी ..........समस्याओं से जूझते हुए  तीनो कदम से कदम मिलाकर साथ चल रहे थे ..समय पंख लगा कर उड़ता रहा  आज वृंदा और ऋतु भी अपनी -अपनी गृहस्थी की एक छत्र साम्राज्ञी थी ........
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अब  !! जब सब ठीक हो चला था  ...और दुःख के बादल छंट चले थे एक समस्या सबको नज़र आ रही थी .........अब माँ की सबसे बड़ी समस्या थी  एकाकीपन ,हालांकि उन्होंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा पर वृंदा और सभी बहने इस को समझ रहे थे ........................
आठ भाई बहनों के साथ पल कर बड़ी हुई माँ का सारा जीवन एक भरे -पूरे संसार में ही बीता जिस समय से वो हमेशा लोहा  लेती रहीं ......आज उसी समय ने उन्हें तोड़  दिया था ..............

जो माँ रसोई से कभी अवकाश नहीं पाती थी अपने लिए दो फुल्के सेकने से भी कतराने लगीं ........कभी -कभी बेटियों के पास जाती थीं हर कोई चाहता था ...वो हमारे पास रहें पर माँ का संस्कारी मन इसके लिए तैयार नहीं होता समझाने बुझाने से भी वो तैयार ना होती थी ...कुछ दिन बाद वो हमेशा अपना सामान समेट लेतीं ......उनकी इच्छा सबके लिए सर्वोपरि थी .....सब उनकी इच्छानुसार  करते .........यही सिलसिला चल रहा था ......
..... इसी एकाकीपन के साथ उन्होंने संसार से विदा ली तो मानो पहाड़ टूट पडा था वृंदा को आज भी याद है वो रात ..............सभी बहने गले लग खूब रोयीं थीं ......... 
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उनके जाने के बाद एक रिक्तता आ गयी थी ......
घर जो पिता ने परिश्रम से निर्मित किया , माँ ने परिवार के साथ मिल भावनाओं से सिंचित किया .....आज चार दीवारों के साथ मकान नज़र  आ रहा था ...घर की हर चीज़ अपनी जगह पर थी ...दीवारें सूनी  थीं 

हर चीज़ खरीदने के पीछे की कहानी बरबस याद आ जाती, सबके साथ अनेक रोचक और नोक -झोंक भरे ढेरों  क़िस्से थे ...जो चलचित्र की भांति मस्तिष्क पर छाए थे ..... ..............
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अपने जीवन के एक बुरे दौर से गुज़रती वृंदा अतीत की गठरी खोल रही थी आंसू बह रहे थे अचानक गालों पर स्पर्श पा यादों से लौट आई ...
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बेटा आंसू पोंछ रहा था ...
बस अब हर सपना इसकी आँखों से देख रही थी  वृंदा 
क्या हुआ माँ ???  नानी की याद आ रही है ..या ...????
उसने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया .. माँ में हूँ ना चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा , सब कुछ समझने लगा था अक्षित ..बड़ा हो रहा था वो , बोलता नहीं था पर वृंदा जानती थी , सब कुछ उसके मन में है ........  ...... 

वृंदा ने बेटे की आँखों में झांका वहां भी एक नन्हा इन्द्र धनुष नज़र  आ रहा था शायद आसमान से उतर कर उन  आँखों में समा गया था .. या सबके पास अपना -अपना इन्द्र धनुष होता है समझ नहीं पायी वृंदा ......????????????
वृंदा ने उसके  दोंनो हाथ थाम लिए इस   मज़बूत संबल में नन्हा सा इन्द्र धनुष  अपने सातों रंग  के साथ था  , वृंदा ने सोचा ये रंग कभी आँखों से उतर कर उसके सपनों में रंग ज़रूर भरेंगे ......... वृंदा ने  बड़े ही विश्वास के साथ मुस्करा कर बेटे को प्यार कर लिया .....................उसकी आँखों में अभी भी इन्द्र धनुष चमक रहा था .............
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Sunday, 16 October 2011

आँखों में इन्द्र धनुष..............


चाय बना कर वृंदा ने गैस बंद की और कप लिए कमरे में आ गयी ,
दूध भी अपने उफान को अंजाम देने के लिए तैयार ही था पर वृंदा के मन में एक तूफ़ान था जो उसे बे-चैन किये था बाहर से आ रहे  तेज़ बारिश के  शोर ने बेचैनी और बढ़ा  दी
कुछ  भी अच्छा नहीं लग रहा था वृंदा को

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क्या करे ....!!! क्या होगा ..??? आज उनके एक गलत कदम ने उन्हें जिंदगी  के कई वर्ष पीछे धकेल दिया था ...काफी दिन के तनाव और उठा पटक के बाद वो दिन आगया  था जिस से वो बचना चाहते थे ...,अब कोई चारा भी नहीं था , कल उसके घर का पंजीकरण हो गया था आज अपने ही छोटे से घर में मालकिन से बेगानी चुकी थी ....एक पल को तो लगा था कोई बुरा सपना देख रही है , पर सब सच था .

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 शेयर बाज़ार ने उसके पति को ऐसा जकड़ा कि  बार -बार की चेतावनी भी उन्हें चंगुल से बचा नहीं सकी और 
आज वो अपने नीड़ को  तिनका -तिनका होते देख रही थी .........बड़े ही कष्ट उठा कर   इस फ्लेट को   अपना कह पाए थे ज़्यादा दिन नहीं रही ये खशी और मुट्ठी से रेत की भांति फिसल गयी थी | ...आह ..!!! एक टीस उठी उसके दिल में .. आज संकट की इस घडी में उसे अपने माता- पिता  दोनों ही बहुत याद आ रहे थे 
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पिता तो कब के जा चुके थे , माँ को गए एक ही साल हुआ था ........ उनका संघर्ष  ! जो उन्होंने पग -पग पर किया था .... उसके लिए प्रेरणा था .!..चलचित्र की भांति ही सब घूम रहा था .
वृंदा , अतीत का एक -एक पल .....जी लेना चाहती थी फिर से 
संकट की इस घडी में ये पल संबल बन गए थे ....... 
अचानक दरवाज़े पर दस्तक ने उसे वर्तमान में ला पटका 
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बेटा अक्षित स्कूल से लौट आया था .. सर से पैर तक भीगा सामने खडा था .....जाओ कपडे बदल लो.....बैग हाथ से लेकर उसने निर्देश दिया और बाहर झांका बारिश अभी थी  .......... 
मम्मा क्या बनाया है ......??  रोज़ यही सवाल ......खाने में हमेशा एक नखरा जो वृंदा को बिलकुल पसंद नहीं पर कभी -कभी समझौता करती है आज उसका मन नहीं था बहस में पड़ने का तो बोली .....
तुम क्या खाओगे ..?????? आलू परांठा और नानाजी का नमकीन .......ठीक है ....बेटे के लिए ब्रंच बनाया प्रतीक्षित दूध को भी उबाल तक अंजाम दिया ... नाश्ता दे कर वही आ बैठी 
बेटा रोज़ की ही भांति खाते -खाते अपने दिन भर का घटना क्रम सुना रहा था और वो अनमनी सी सुन रही थी 
वृंदा ने घडी पर नज़र दौड़ाई अभी अनुज को आने में समय था
बाहर झांका  बारिश रुक चुकी थी  सामने  थी  ईश्वर की एक  सुन्दर रचना  इन्द्रधनुष !!!....जिंदगी  भी बिलकुल इसी तरह होती है अनेक रंगों से भरी ......सोचा उसने 

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अतीत की परतें खुलती गयीं  .......मम्मा मुझे एन सी सी के कैम्प जाना है ...ठीक है सब तैयारी अच्छी तरह करना , मम्मा मुझे आज देर हो जायेगी .....अच्छा आज .खाना लेकर जाओ .........ना जाने ऐसी ही कितनी घटनाएं ...........मम्मा आज हमारे स्कूल में मेला लगा है .....मम्मी आज रामलीला चलें ...ना जाने कितनी  ही यादें ??????.
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एक बड़े परिवार के  दायित्व निभाते हुए मध्यम वर्ग की ज़िंदा दिल और  साहसी महिला थीं वो ........
पांच  बेटियां , बूढी बीमार  सास और पति सुबह से शाम तक असीमित कार्य थे .......बावजूद इसके वो अपनी रुचियों को बरकरार रखे थीं ,पढ़ना ..सिलाई बुनाई , संगीत .....उनकी जिंदगी की रीढ़ थे ...अपने दायित्वों में उन्होंने अपनी रुचियों को खोने नहीं दिया .........मोहल्ले में होने वाली सभी महिला संगीत क़ी जान थीं वो ..
उनकी थाप के बिना लय ही नहीं बनती थी 
ईश्वर ने गज़ब सौन्दर्य दिया था ....साधारण साड़ियों में भी वो आकर्षण बनाए रहती थी ,,....सजते -संवरते कभी  नहीं देखा था ,शौक नहीं था या परिस्थितियों ने साथ नहीं दिया कभी समझ नहीं पायी वृंदा .............कभी वृंदा को लगता कि अभावों के चलते उन्होंने अपनी इच्छाओं का दमन किया था
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पांच बेटियों के पिता होते हुए भी पापा और मम्मा हमेशा खुश और संतुष्ट नज़र आते ...अपनी बेटियो के साथ बड़े ही खुश नुमा  माहौल में जीवन बिता दिया रहे थे ....दादी को कई बार अपने इकलौते बेटे के बेटे को देखने की उत्कंठा होती ....और वृंदा को लगता है कि शायद यही कारण रहा होगा कि माँ ने हम कई बहनों को जन्म दिया ...........बहुत शांत , सुलझे और सोच- समझ के साथ निर्णय लेने वाले उसके पिता बेटियों के बहुत करीब थे 
ऐसे पिता और बहुमुखी प्रतिभा  की धनी माँ ने अपनी बेटियों  को भरपूर स्नेह और विश्वास दिया था .....अभाव भी रहे , तंगहाली भी झेली ......  पिता अपनी नौकरी में राजनीति के शिकार हो गए  और नौकरी गँवा बैठे थे  बड़ा परिवार था पर पिता और माँ हमेशा समय से संघर्ष करते नज़र आते थे ......... ........------------------------------------------------
मम्मा , पापा आ गए .....अक्षित की आवाज़ ने तन्द्रा भंग कर दी ......वह चौंक कर उठी ...."सुनो एक शादी में जाना है , अभी निकलना है खाना नहीं खाउंगा , जाना ज़रूरी है वरना मन नहीं है मेरा बिलकुल भी जाने का ,  अनुज अन्दर आते हुए बोले 
 जिंदगी किसी के लिए नहीं रूकती तुम्हे जाना ही चाहिए 
वृंदा ने कुछ सोच कर कहा
जानती थी अनुज भी इतनी बड़ी घटना के बाद अच्छा  महसूस नहीं कर रहे हैं ..... वृंदा को बड़ी राहत मिली ...खाना बनाने के झंझट से बच गयी थी वो  आज सिर्फ अपनी यादों में खो जाना चाहती थी .
अनुज देर से आने को कह ,जल्द ही निकल गए 
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और आज वृंदा सब कुछ भूल अपने बचपन से लेकर युवा होने तक का समय फिर से यादों में जी लेना चाहती थी ..
समझदार होने पर वो कायल हो गयी थी माता -पिता की....!!!! 
अचानक अतीत का एक पन्ना पलटा और पिता अस्पताल में नज़र आये वृंदा और ऋतु अभी पढ़ रही थीं बाकी तीन  बहने शादी के बाद अपनी - अपनी गृहस्थी  में व्यस्त थीं ......उन दिनों बहुत संवेदनशील और भावुक माँ किसी चट्टान  की तरह नज़र आयीं
जब कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था ..माँ ने आगे बढ कर पिता को मेडिकल में भरती कराने का फैसला कर डाला था ....सबको लग रहा था कुछ नहीं होना वाला है पर माँ के निर्णय को सभी ने सम्मान दिया था ...... तीन दिन के कुछ असहनीय और कठिन पलों के बाद जिंदगी ने निर्णायक मोड़ ले लिया  और पिता असमय ही  अनंत यात्रा पर निकल पड़े  

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सब कुछ बिखर गया ..... माँ के पास कुल जमा पूँजी  थी  थोड़ा सा पैसा ,एक घर ,  दो बेटियाँ  ..लेकिन अभी बेटियों की पढ़ाई के साथ -साथ अनेक समस्याएँ मुह बाए सामने थीं .....लेकिन माँ ने खामोशी ओढ़ ली और अपने दायित्व निर्वाह में लग गयीं 
माँ ने सब कुछ बड़ी ही खामोशी से संभाल लिया था ...एक अनकहा समझौता वृंदा , ऋतु और माँ के बीच हो गया था ...जिंदगी धीरे -धीरे चल निकली थी ..........समस्याओं से जूझते हुए  तीनो कदम से कदम मिलाकर साथ चल रहे थे ..समय पंख लगा कर उड़ता रहा  आज वृंदा और ऋतु भी अपनी -अपनी गृहस्थी की एक छत्र साम्राज्ञी थी 
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अब  !! जब सब ठीक हो चला था  ...और दुःख के बादल छंट चले थे एक समस्या सबको नज़र आ रही थी .........अब माँ की सबसे बड़ी समस्या थी  एकाकीपन ,हालांकि उन्होंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा पर वृंदा और सभी बहने इस को समझ रहे थे 
आठ भाई बहनों के साथ पल कर बड़ी हुई माँ का सारा जीवन एक भरे -पूरे संसार में ही बीता जिस समय से वो हमेशा लोहा  लेती रहीं ......आज उसी समय ने उन्हें तोड़  दिया था 
जो माँ रसोई से कभी अवकाश नहीं पाती थी अपने लिए दो फुल्के सेकने से भी कतराने लगीं ........कभी -कभी बेटियों के पास जाती थीं हर कोई चाहता था ...वो हमारे पास रहें पर माँ का संस्कारी मन इसके लिए तैयार नहीं होता समझाने बुझाने से भी वो तैयार ना होती थी ...कुछ दिन बाद वो हमेशा अपना सामान समेट लेतीं ......उनकी इच्छा सबके लिए सर्वोपरि थी .....सब उनकी इच्छानुसार  करते .........यही सिलसिला चल रहा था ......
..... इसी एकाकीपन के साथ उन्होंने संसार से विदा ली तो मानो पहाड़ टूट पडा था वृंदा को आज भी याद है वो रात ..............सभी बहने गले लग खूब रोयीं थीं ......... 
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उनके जाने के बाद एक रिक्तता आ गयी थी ......
घर जो पिता ने परिश्रम से निर्मित किया , माँ ने परिवार के साथ मिल भावनाओं से सिंचित किया .....आज चार दीवारों के साथ मकान नज़र  आ रहा था ...घर की हर चीज़ अपनी जगह पर थी ...दीवारें सूनी  थीं 
हर चीज़ खरीदने के पीछे की कहानी बरबस याद आ जाती, सबके साथ अनेक रोचक और नोक -झोंक भरे ढेरों  क़िस्से थे ...जो चलचित्र की भांति मस्तिष्क पर छाए थे ..... ..............
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अपने जीवन के एक बुरे दौर से गुज़रती वृंदा अतीत की गठरी खोल रही थी आंसू बह रहे थे अचानक गालों पर स्पर्श पा यादों से लौट आई ...
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बेटा आंसू पोंछ रहा था ...
बस अब हर सपना इसकी आँखों से देख रही थी  वृंदा 
क्या हुआ माँ ???  नानी की याद आ रही है ..या ...????
उसने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया .. माँ में हूँ ना चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा , सब कुछ समझने लगा था अक्षित ..बड़ा हो रहा था वो , बोलता नहीं था पर वृंदा जानती थी , सब कुछ उसके मन में है ........  ...... 
वृंदा ने बेटे की आँखों में झांका वहां भी एक नन्हा इन्द्र धनुष नज़र  आ रहा था शायद आसमान से उतर कर उन  आँखों में समा गया था .. या सबके पास अपना -अपना इन्द्र धनुष होता है समझ नहीं पायी वृंदा ......????????????
वृंदा ने उसके  दोंनो हाथ थाम लिए इस   मज़बूत संबल में नन्हा सा इन्द्र धनुष  अपने सातों रंग  के साथ था  , वृंदा ने सोचा ये रंग कभी आँखों से उतर कर उसके सपनों में रंग ज़रूर भरेंगे ......... वृंदा ने  बड़े ही विश्वास के साथ मुस्करा कर बेटे को प्यार कर लिया .....................उसकी आँखों में अभी भी इन्द्र धनुष चमक रहा था .............

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Saturday, 15 October 2011



जनसत्ता के साथ हमारी याद


by अरुणा सक्सेना on Friday, May 27, 2011 at 7:37am
जनसत्ता में छपा मेरा अंतिम पत्र ...अब तो जनसत्ता की याद भर रह गयी हैं एक समय था जब जनसत्ता सर्वश्रेष्ठ समाचार पत्र था ओर हमारा खाना हज़म नहीं होता था पढ़े बिना.....लेकिन प्रभाष जोशी के साथ ही उसका आकर्षण भी चला गया
.एक चुनाव में जब इमरान खान(पकिस्तान) हार गया ,वो नौ जगह से खड़ा था औरसब जगह से हार गया तब हमारी आराधना बहनजी ने क्या कहा जनसत्ता के ज़रिये ....

कायस्थ समाज

१९४७ में विभाजन के बाद एक बार किसी ने मोहम्मद अली जिन्ना से पूछ कि 
आप अब भारत से अलग हो गए हैं ......
सबसे ज़्यादा क्या अखरेगा....?????
ऐसा क्या है जो वहां है यहाँ नहीं.....???......
.जिन्ना ने कहा ...एक बुद्धि  जीवी वर्ग ..कायस्थ , 
सबसे ज्यादा कायस्थों को ....याद करेंगे जो अब...हमारे देश में नहीं है...और ना ही अब होंगे .................

माँ

माता -पिता को याद करने के लिए हम किसी दिन के आधीन  नहीं हैं.
लेकिन मम्मा ..क्यों कि  आज का दिन सभी माताओ को समर्पित है ...
तो वो यादें जो कभी धुंधलाई भी नहीं ..
आज और मुखर हो गयी हैं
और इस रिश्ते को शब्दों  में नहीं समेट सकते     
सच हम सब बहुत याद करते है आपको 

माँ शब्द एक खूबसूरत, व्यक्तित्व की पहचान है  
माँ तुझ पर मुझे, बड़ा ही अभिमान है  
लिपटी थी आँचल में तेरे, अनुभव मीठे -मीठे घेरे  
क़र्ज़ है माँ दूध का तेरे , यादें दिल में करें बसेरे  
साया दुःख का कभी ना आया , दुःख का बादल कभी ना छाया  
जब तक साथ रहा माँ तेरा , दुःख को तुने दूर भगाया  
सर  पर  तेरे आँचल को माँ , आज भी मैंने अपने पाया  
तेरी ममता के आँचल में , एहसास सदा अनोखा पाया  
यादों में तू सदा रहेगी , कमी ये तेरी सदा खलेगी

पिताजी की बात



मेरे पिता कहा करते थे , कि जिंदगी गणित की तरह होती है |
 जिसमे आसान और कठिन समस्या ही समस्या होती हैं , 
लेकिन हल सबका होता है |
सिर्फ धीरज  के साथ  हल निकालो , जब कभी खुद हल न निकले तो दूसरे की मदद लो लेकिन  सफल होने की  कोशिश करो....
वो खुद भी बहुत शांत और सुलझे हुए व्यक्ति थे 
हमने उन्हें कभी भी आक्रामक और धर्य खोते हुए नहीं देखा 
परिस्थितियां कैसी भी हो , वो शांत रहते थे .
आज जब खुद को कहीं घिरा पाती हूँ तो उनकी ये आशावादी बात मुझे याद आती है पर कई बार हल नहीं  निकलता.
काश आप होते आज पिताजी !!!!!!!!!

काश आप होते आज पिताजी!!!!!!

बचपन




on Friday, April 1, 2011 at 7:31pm


हँसते- रोते , मुस्कान फैलाते  ,

मुक्त खिलखिलाहट बिखराते 

निष्कपट मन  से प्यार लुटाते , 

जिसका स्नेह पाते उसके हो जाते  

समाज की मानसिक संकीर्णता से दूर , 

पर समझ -बूझ से भर पूर  

जो मासूमियत और बचपन से भरपूर  

बाल क्रीडा फैलाते ,ये नन्हे बालक कहलाते 

जीवन के अति सुंदर क्षण  बाल्यावस्था  में ही बीत जाते  

काश  !!!!  हम सदा बच्चे ही रह पाते ,

काश  !!!!  हम सदा बच्चे ही रह पाते 

जो भी लिखा आपके सामने है मित्रों


भावनाओ के वेग से निकले हैं कुछ छंद 

विदित नहीं है हंसू या रोऊँ या मुस्काऊं मंद |

दिलो ,दिमाग पर 'जंग' लगा है पल -पल लड़ते 'जंग',


 महंगाई की मार पड़ी है स्वप्न हो रहे भंग |

घर में थोड़ा 'भात' पडा है पापी पेट का प्रश्न बड़ा है


 ,,कल की फिक्र से सुलगा चूल्हा 'यक्ष प्रशन' फिर भी खडा है |

चहुँ ओर काला पहरा है घोर निराशा ने घेरा है ,


आशा- निराशा की जंग में आशा का परचम फहरा है|

स्वप्नों ने लेकर अंगडाई मन में हलचल और बढाई ,

,
 रुख किया 'रण भूमि' का अब 'रण भेरी' दे रही सुनाई 

प्रतिबध्धता' है मेरी अब इन सपनो के संग

,
कोई 'उर्वशी' कितना भी चाहे करे तपस्या भंग

तम की चादर,




तम की चादर ओढ़ सांझ ने ,
धीरे-धीरे पाँव पसारा

आँख  मिचौली खेल ज़रा सी ,,
तम उर में छिप गया उजाला 


पलकों में सिमटे ख्वाबों ने , 
थोड़ी सी लेकर अंगड़ाई 


अभिनन्दन करके निद्रा का, 
सीमा  अपनी और बढाई


समां गए सपने अंखियों में, 
पलक लगे ढलके-ढलके


लोरी भी गा रही ख़ामोशी,, 
सहलाती हलके-हलके

एक सिक्के के दो पहलू





 Friday, April 8, 2011 at 5:26pm
जिंदगी-----

 एक गीत है जो बहुत दर्द भरा है 
 एक पथ है जो अंत हीन है 
 एक सेज है जो काँटों से भरी है 
 एक ख्वाब है जो पूरा नहीं होता  
एक फूल है जो निश्चित रूप से खिलता, मुरझाता और टूटता है.
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-जिंदगी ----
एक झील है जो खुशियों से भरी है.. 
प्रेरणा है , जो चलने को प्रेरित करती है 
एक एहसास है ,जो आनंद दायक है  
दुखों का अंत और 
शुभारम्भ है खुशियों का ....:):)

प्रकृति हमसे रूठ गयी है ..



जीवन ईश्वर का वरदान , हर श्वास है कर्ज़दार 
प्रकृति हमारी पालन हार  , क्यों ना माने उसका आभार 
प्रकृति ने मानव जाति को  अमृत  घूँट - घूँट दिया है 
 कृतज्ञ कोई नज़र ना आता कृतघ्नता से जुड़ा है नाता 
हरियाली को दूर भगा कर , कंक्रीट ने पौध लगाई .
शोक में डूबी हरियाली अब काले साए सी है घबराई 
पंछी कलरव की गयी बहार ,  पंछी नज़र ना आते द्ववार 
शुद्ध पवन की गयी बहार , उमस घुटन हर पल तैयार |
 टिम- टिम जुगनू नज़र ना आते , बचपन में थे बहुत वो भाते 
इन्द्र धनुष भी विलुप्त हो गया , प्रकृति के रंग संग  ले गया
इन्द्र देव क्रोधित हुए हैं ,  सावन भादों शुष्क हुए हैं 
मौसम समय पर नज़र चुराते , प्रकृति के तांडव में खो जाते |
क्या खोया ,क्या नहीं है पास ,  आज करे यदि ये एहसास 
अनमोल रत्न था प्यारा -प्यारा , प्रकृति का हंसता नज़ारा 

श्रधान्जली या आशीर्वाद





on Saturday, October 1, 2011 at 1:21pm



ये आशीर्वाद कभी मेरी बडी बहन की शादी के लिए लिखा गया था...मैने  ही ये शब्द लिखे १९८७ में 
लेकिन आज ये श्रधान्जली है उसके लिए.....
:(....missing u sis.....

शुरु हो रहा है नव जीवन,, आज पराए घर जाकर
स्म्रतियाँ सम्बल हैं यहाँ की ,,अपनाना उसको जाकर
शेष हो गए वो लघु क्षण  अब , बंधा था जिनका हमसे तार 
नाए क्षनो का  संग्रह करना,, इन्हे  बनाना    आधार
स्नेह मयी माता ही देंगी, तुमको अब वो लाढ़ दुलार .
प्यार के इस सागर  में पाना ,,तुम अपने जीवन का सार
हँस- मुख 'प्रमोद' के हास्य- व्यंग से ,तुम हो जाना ओत -प्रोत
अब तो वो घर ही है तेरे, सुखद भविष्य का सम्रध स्रोत
'पूनम' और 'श्री जय  प्रकाश जी'', वरद हस्त सिर पर रखते हैं 
ये पथ रहे सदा निष्कन्टक ,यही दुआ दिल से करते हैं
भाइ - बहन सब देते प्यार, व्यथित ह्रदय का सच्चा प्यार 
कामनाएं भी  कुछ दिल की हैं ,, सुख से भरा रहे सन्सार
शुभाशीष दे मात - पिता अब , विदा व्यथित हो कर करते हैं 
गृह लक्ष्मी बन मूल्य चुकाना ,, उन अश्कों का जो बहते हैं
दो कुल की ये कीर्ति पताका ,सदा ही उन्ची लहराए 
आज सौन्पते हाथ  तुम्हारे , विश्वास ना खण्डित हो पाए