Friday, 10 May 2013

आँगन में हर सिंगार .




हमारे आँगन में दरवाज़े के पास
निश्छल खड़े तुम सबको तकते हो
अपना साम्राज्य स्थापित किये हो सालों से

तुम ही हर आगंतुक का स्वागत करते हो .....
भोर होते ही झूमती हैं
नन्ही रचनाएं
जो तुम्हारी शाखा से
विमुख हो धरा को चूमती हैं .....
अभिमान से धरा को ढक
सबके कदम चूमती हैं
अरे हाँ तुम ही हो ना मेरे आँगन के हर सिंगार ....

15 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शनिवार (11-05-2013) क्योंकि मैं स्त्री थी ( चर्चा मंच- 1241) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सादर आभार शास्त्री जी

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  2. बहुत सुन्दर कविता .....

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    2. आभार सखी उपासना

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    1. संगीता जी आपका आभार

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  4. बहुत ही सुन्दर रचना...आभार.

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    1. आभार राजेंद्र जी

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  5. बहुत सुन्दर रचना ....
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post'वनफूल'
    latest postअनुभूति : क्षणिकाएं

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    1. कालीपद जी आभार आपका

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  6. अच्छी रचना, बहुत सुंदर

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    1. महेंद्र जी आभार आपका

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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    1. कैलाश जी हार्दिक आभार

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