Saturday, 27 April 2013

सुख और दुःख




सुख और दुःख धरती के, ध्रुव की तरह होते हैं
लेकिन प्रतिक्रया में दोनों के, आंसू ही होते हैं
एहसास में दर्द के, झलकते हैं हैं आंसू
आवेग में ख़ुशी के ,टपकते हैं आंसू
बहुमूल्य  है वो बूँद, जो आँखों में लरजती है 
टपके ना जब तक ,कीमत पता नहीं चलती है 
भावनाओ का वेग जब, अश्कों में बदल जाता है
उर का वो तूफ़ान , नैनों से निकल जाता है
गिरने वाला हर अश्क ,एक जैसा नज़र आता है
सुख - दुःख का रिश्ता, इन अश्कों से बांध जाता है 
क्या है फर्क   ???    और किस से इसका नाता है 
आँख और अश्कों के सिवा कोई नहीं जान पाता है 
सच्चा हम दर्द ही, ये जान पाता है कि
टपकी बूँद का किससे (दुःख या सुख ) ,, नज़दीक का नाता है

16 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (28-04-2013) अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो : चर्चामंच १२२८ में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सादर आभार मयंक जी .........:)

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  3. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतीकरण,आभार.

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    1. राजेंद्र जी हार्दिक धन्यवाद ...........

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  4. बेहतरीन प्रस्तुति

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    1. हार्दिक धन्यवाद शांति जी ......

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  5. सुख और दुःख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है ..बहुत सही बात की आपने

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    1. हार्दिक धन्यवाद उपासना जी ......

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  6. सच आँसू जब तक आँखों के अंदर रहते हैं तभी तक आँसू है ,बहने के बाद तो मोती बन जाते हैं .......

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    1. सच कहा आपने निवेदिता जी हार्दिक आभार ......

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  7. सच कहा है ... ये बात तो बस आंसू ही समझ सकते हैं ... क्यों निकलते हैं ...
    सम भाव रखते हैं आंसू ....

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    1. आभार दिगंबर जी

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  8. बहुत गहन एवं सशक्त .....!!लाजवाब प्रस्तुति

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    1. हार्दिक धन्यवाद संजय जी

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