Monday, 10 June 2013

बरखा रानी बरखा रानी









बरखा रानी बरखा रानी 
मत करो अपनी मनमानी 
सता चुके हैं सूरज दादा 
अब लेकर आजाओ पानी 
छुट्टियाँ बीती नानी के घर 
पसीना बहा खूब अंजुली भर 
मंच सज़ा है आओ तो 
आकर मुह दिखलाओ तो 
हर आहट पर इंतज़ार है 
गर्मी से हुए बेज़ार हैं
आओ अपना कद पहचानो 
अपनी एहमियत को जानो 
मंतव्य हमारा पूरा करदो 
सबके मन खुशियों से भर दो 
अभिनन्दन को खड़े तैयार 
बरखा रानी आये तो द्वार

Saturday, 8 June 2013

लघु कथा

बात उस दिनों की है जब जंगल हुआ करते थे -------------
कई जानवर ,मरे जानवरों को खाकर वहां की गंदगी हटा देते थे उनमें लोमड़ी और गिद्ध प्रमुख थे 
जंगल रहे नहीं मानव भेष धर गिद्ध और लोमड़ी ने शहर की राह पकड़ी ...
जंगल को साफ़ करने वाले अब समाज को प्रदूषित कर रहे हैं ......

Friday, 7 June 2013

पारिजात के पुष्प













छोटे और सुन्दर पारिजात के पुष्प
जन्म लेते ही भारी विपदा से निपटते हैं
भोर की पहली किरण पर झूमते
नत मस्तक हो धरा को चूमते हैं
नियति मान कर्तव्य का मान रख
पारिजात के योद्धा चुनौती को निकलते हैं
बिना सिलवटों के चादर सामान
धरा को ढक अभिमान से ,प्रणेता को तकते हैं
सिर्फ अधिकार नहीं ,दायित्व की भाषा भी खूब समझते हैं
जीवन की आहुति से भी नहीं डरते
जड़ों से कटने का दर्द भी अन्दर ही निगलते हैं ...
.

Friday, 31 May 2013

दर्द ....
















नन्हे पौधों को दरख़्त बनते देखा है , 
मैंने रिश्तों को परवान चढ़ते देखा है 

भावनाओ की हरियाली में ,प्यार से सींचे रिश्तों को जिया है  
अपने-पन का अमृत भी पल-पल पिया है 
जब रिश्ते मज़बूत और मज़बूत होते जा रहे थे , 
तब नन्हे पौधे भी अपने पाँव आँगन में पसार रहे थे 
रिश्ते प्यार के धरातल पर मज़बूत नज़र आते थे , 
नन्हे पौधों में भी दरख़्त बनने के आसार नज़र आते थे 

समय ने रिश्तों को मज़बूत डोर में बाँध दिया ,
पौधों ने भी दरखत बन आँगन में छाँव का समां बाँध दिया  
कुछ पंछियों  ने  दरख्तों पर आशियाना  बना लिया और  
उनके कलरव को वहां - वहां  सबने अपना लिया  

समय बीता तो रिश्ते कुछ दूर -दूर होने लगे , 
दिल से तो पास ही थे समय के हाथों  मजबूर होने लगे 
पौधों के भी पत्ते कुछ पीले पड़ने लगे ,, 
पतझड़ आया तो तेज़ी से झड़ने लगे 
पंछी घोंसले उनके  नन्हों से रिक्त होने लगे  

जल्द ही वहां वीराना पाँव पसारने लगा 

रिश्तों में दरके जाने का डर नज़र आने लगा 

दरख्तों  को किसी ने उखाड़  दिया ,,
 एक ही झटके में उन्हें उजाड़ दिया  
पर रिश्तों को दरका न सका   !!!!!!! 
जिस आरी को दरख्त सह न पाया, 
उसका वार रिश्तों पे चल न सका   

नियति के इस खेल को भावनाओ  ने जिता दिया  
आरी के वार से अपनेपन को बचा लिया 
समय ने एक करवट ली और सब छिटक कर दूर हो गए  
शायद बहुत  मजबूर  हो गए  !!!!!
दूर ज़रूर हो गए पर अपने प्यार और संस्कार की बदौलत  
आज भी साथ खड़े नज़र आते हैं 
दरख्तों के कटने पर ज़रूर आंसू बहाते हैं.

पंछियों के  कलरव को याद कर, 
दर्द भरी मुस्कान चेहरे पर ले आते हैं.
पर अपने प्यार भरे बंधन पर आज भी इतराते हैं
और ईश्वर से दुआ मनाते हैं 
कि इन रिश्तों को दरकने से बचाना और  
हे ईश्वर इन्हें यूंही परवान चढ़ाना  
 हे ईश्वर इन्हें यूंही परवान चढ़ाना 


Wednesday, 29 May 2013

हाँ में बांस हूँ













.हाँ में बांस हूँ


बेहद सघन
लम्बी हरी रचना का संगठन
मिटटी को जड़ में जकड
लेता यहीं सांस हूँ
..जाति में घास हूँ
हाँ में बांस हूँ

'हरा सोना' बन
ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता हूँ ..
अदभुद क्षमता
विकिरण हरने की रखता हूँ......
प्रदुषण रहित इंधन बन
यहाँ भी कुछ ख़ास हूँ
..हाँ में बांस हूँ

Saturday, 25 May 2013

मेरा गाँव














.एक चौपाल ,असंख्य पेड़ों की छांव, लहलहाते खेत

यही था मेरा गाँव ..

घर -घर में मिटटी और गोबर की लिपाई-पुताई ,

वाह !! क्या साफ़- सफाई

कहीं कोई दादी ,चाची और ताई , न कोई बनावट और न झूठा आवरण

सिर्फ अपनापन और सच्चाई

औपचारिकता के दायरे से बाहर रिश्तों का आभास

गुड और साथ में मट्ठे का गिलास

प्यार के साथ-साथ ,खाने में भी सबका भाग

चूल्हे की सौंधी रोटी और प्यार के तडके का साग

आह !!! शहर की पक्की सड़क पर खो गया

वो प्यार और अपनापन ,

खाने की मिठास और मिटटी का सौंधापन

औपचरिक लिबास पहन , पकड़ ली शहर की राह

गाँव के प्यार और अपने पन की अब भी कहीं उठती है चाह ....

गाँव के प्यार और अपने पन की अब भी कहीं उठती है चाह ........

Thursday, 23 May 2013

एक पुरानी रचना ----भावनाओं का ज्वार





१---ताला खोलते ही अन्दर कुछ चटकता है 
भावनाओं का ज्वार गले में अटकता है 
याद आ जाता है वो ----

एक मुखड़ा निश्छल हंसी , तृप्ति के साथ 
जब बढ़ आते थे स्वागत को माँ के हाथ 
गले मिल उमड़ता आँखों में सैलाब 
मन करता करूँ जोर -- जोर से प्रलाप 
गले लगा कर कन्धों को थपथपाना 
और अपने आंसुओं को आंचल में छिपाना .

मानो उनके पंख उग आते थे 
जब हम बच्चों के साथ माँ के घर जाते थे












२---उदास सुनी रसोई भी मुस्कराती ,
बर्तनों के साथ खुल कर खिलखिलाती
नल का पानी जल तरंग बजाता
तो बर्तनों का साज नयी धुन पर इतराता
कलछुल बेफिरी से छौंक लगाती
कुकर की सीटी भी अलग अंदाज़ दिखाती
दूध और दलिए के आदी ये बर्तन
उत्साह से भर जाते और
हर नए पकवान में अपना योगदान निभाते थे














३---जब तक बच्चे रहते घर का हर कौना गुलज़ार रहता .
खिलखिलाहटों और ठहाकों का दौर बरकरार रहता
आइसक्रीम , गुब्बारे वाले जोर से आवाज़ लगाते
देर तक दरवाज़े के पास ही मंडराते
बच्चों के जाने का दिन आता तो वो बेज़ार हो जातीं
उनके चेहरे की प्रफुल्लता गायब हो जाती
रसोई बे--रौनक ,कढाई बे--नूर नज़र आती
वो दिन , वो यादें दिल के बहुत पास है ...
उनके साथ बीता हर लम्हा बहुत ख़ास है ..















आज भी ताला खोला तो जालों का अम्बार है
धूल का साम्राज्य और उमस की भरमार है ..
कुछ दिन यहाँ रह कर 'मकान' को 'घर' बनायेंगे
उन मीठी 'यादों' को अपनी 'बातों' में सहलायेंगे
रसोई के उदास बर्तनों को भी थपथपा कर फुसलायेंगे
कुछ लम्हों को जी कर यहाँ कुछ छोड़ देंगे और बाकी साथ ले जायेंगे
और फिर
ताला बंद कर इस 'घर' को 'मकान' घोषित कर
अगले साल फिर आयेंगे ......
हे ईश्वर हमें साहस देना ये सिलसिला यूँही अनवरत चलता रहे
माता -पिता का ये दर ,बरस हर बरस खुलता रहे

घर की छत