
.एक चौपाल ,असंख्य पेड़ों की छांव, लहलहाते खेत
यही था मेरा गाँव ..
घर -घर में मिटटी और गोबर की लिपाई-पुताई ,
वाह !! क्या साफ़- सफाई
कहीं कोई दादी ,चाची और ताई , न कोई बनावट और न झूठा आवरण
सिर्फ अपनापन और सच्चाई
औपचारिकता के दायरे से बाहर रिश्तों का आभास
गुड और साथ में मट्ठे का गिलास
प्यार के साथ-साथ ,खाने में भी सबका भाग
चूल्हे की सौंधी रोटी और प्यार के तडके का साग
आह !!! शहर की पक्की सड़क पर खो गया
वो प्यार और अपनापन ,
खाने की मिठास और मिटटी का सौंधापन
औपचरिक लिबास पहन , पकड़ ली शहर की राह
गाँव के प्यार और अपने पन की अब भी कहीं उठती है चाह ....
गाँव के प्यार और अपने पन की अब भी कहीं उठती है चाह ........
Purani or achchi yaade taja hui aapki is rachna se.....bahut achchi rachna
ReplyDeleteशुक्रिया शांति जी
Delete
ReplyDeleteहाँ, था गाँव में अपनापन और प्रेम लेकिन यह अब पुराणी बात है नए जमाने की बाजारीकरण की हवा अब गाँव में भी पहुँच गया -आपकी कविता स्मृति को ताज़ा करती है
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
latest post: बादल तू जल्दी आना रे!
latest postअनुभूति : विविधा
आपकी बात से सहमत हूँ गाँव भी अछूते नहीं शहरीकरण से
Deleteबहुत सुंदर अच्छी रचना
ReplyDeleteशुक्रिया महेंद्र जी
Deleteआभार अरुण जी
ReplyDeleteगाँव की अनभूतियो का सहज और सुंदर वर्णन
ReplyDeleteसादर
आग्रह हैं पढ़े
ओ मेरी सुबह--
http://jyoti-khare.blogspot.in
आभार ज्योति जी
Deleteदिल छू गयी ये रचना. बहुत बढ़िया लिखा है. गाँव से जितना दूर हुआ, झूठा आवरण उतना ही बढ़ता गया.
ReplyDeleteबहुत ही खूब अरुणा आपने बिल्कुल बचपन याद करा दिया
ReplyDeleteआभार सरिता जी
Deleteमीठी यादें बस अब यादें बन के रह गई हैं ...
ReplyDeleteशहर की पक्की सड़क ने गाँव को भी गाँव नहीं रहने दिया ... भावमय प्रस्तुति ...
बहुत सुन्दर ... काश को पुराना समय वापस आ पाता...
ReplyDeleteकाश ऐसा होता धन्यवाद आपका
Deleteवाह बहुत सुन्दर रचना |
ReplyDeleteपीछे छुट गये वो गाँव के गलियारे ,
न जाने इंसा को शहर में ऐसा क्या भाया |
धन्यवाद मीनाक्षी जी
Deleteहाँ कितने खूबसूरत थे वो दिन .........
.बहुत सुन्दर प्रस्तुति .बधाई . . हम हिंदी चिट्ठाकार हैं.
ReplyDeleteBHARTIY NARI .
एक छोटी पहल -मासिक हिंदी पत्रिका की योजना
धन्यवाद शिखा जी
Delete